बाल श्रम और कानून
होमर फलेक्स के अनुसार, बालकों द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य जो उनके पूर्ण शारीरिक विकास, न्यूनतम शिक्षा तथा आवश्यक मनोरंजन में बाधक हो, वो बालश्रम कहलाता है। बाल श्रम का अर्थ बच्चों को उत्पादन से संबंधित ऐसे लाभकारी व्यवसाय में लगाना है जिससे उनके स्वास्थ्य को खतरा हो तथा उनके विकास में बाधक हो। ये सिर्फ उद्योगों में लगे हुए बच्चों पर ही लागू नहीं होता है। ये उन तमाम छोटे-मोटे व्यवसायिक काम जो 18 वर्ष की कम आयु वाले बच्चों के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और नैतिक विकास में रूकावट डाले वो सब भी बालश्रम कानून के तहत आता है।
बाल श्रम अपने आप में एक सामाजिक कलंक है। ये समस्या सबसे पहले अन्र्तराष्टï्रीय स्तर पर 1924 मेें जेनेवा में उठायी गयी। इसी घोषणा पत्र में बच्चों के अधिकार को मान्यता देते हुए पांच सूत्री कार्यक्रम की घोषणा कर दी गई। साथ ही साथ बालश्रम को प्रतिबंधित भी कर दिया गया। 1989 में संयुक्त राष्टï्र के सदस्यों द्वारा बालश्रम को रोकने के लिए और दण्ड के प्रावधान को लेकर हस्ताक्षर किये गये।
भारत में बाल अधिकार
बाल अधिकार अधिनियम 1933, बाल रोजगार अधिनियम 1938, भारतीय कारखाना अधिनियम 1940 ऐसे कुछ प्रावधान बालश्रम को रोकने के लिये थे। जो स्वतंत्रता पूर्व बनाये गये थे और आज भी लागू हैं। स्वतंत्रता के बाद 1952 में पारित औद्योगिक विवाद अधिनियम में भी बाल श्रम निषेध कर दिया गया। संविधान के तहत ये सुनिश्चित किया गया कि 6 से 14 वर्ष तक की आयु वालेे सभी बच्चों को मुफत शिक्षा मिलेगी। ऐसे में किसी भी बच्चे को काम पर लगाना कानूनन जुर्म माना जायेगा। राज्य का यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि पैसे के लालच या कमी कि वजह किसी बच्चे क ो बालश्रम के लिये मजबूर न करे।
भारत में बाल श्रम की स्थिति
कई गैर सरकारी सक्रिय संगठनों के मुताबिक भारत में साल 2010 तक 6 करोड़ बाल मजदूर हैं। जिसमें 1 करोड़ बंधुआ मजदूर हैं, क्योंकि वो बंधुआ मजदूर के यहां पैदा हुए होते हैं। जिसमें 50 लाख ओद्योगिक कामों में लगे हुए हैं। राष्टï्रीय बाल अधिकार आयोग की वेबसाइट पर मौजूद 2001 के आकड़ों में बाल मजदूरों की संख्या 1.27 करोड़ है। देश में राष्टï्रीय बाल अधिकार आयोग के अलावा दिल्ली, बिहार और 9 राज्यों में ही बाल अधिकार आयोग है। जो पूरी तरह से सक्रिय नहीं हैं।
बाल श्रम के प्रभाव
चाय की हर छोटी दूकान पर गिलास धोने का काम और चाय देने का काम एक छोटू करता है। जिससे वह बहुत सारी चीजों से वंचित रह जाता है। शिक्षा, नैतिकता और समाजिकता जैसी महत्वपूर्ण चीजों से वो वाकिफ नहीं हो पाते हैं। बाल श्रम की वजह से गरीबी बढ़ी है। जो विकास में सबसे बड़ी बाधा है। अल्पायु में मौत या भयानक रोग से बच्चे चपेट में आ जाते हैं। आने वाली पीढ़ी को समस्याएं विरासत में मिलती हैं। देश का भविष्य इससे खराब होता है।
होमर फलेक्स के अनुसार, बालकों द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य जो उनके पूर्ण शारीरिक विकास, न्यूनतम शिक्षा तथा आवश्यक मनोरंजन में बाधक हो, वो बालश्रम कहलाता है। बाल श्रम का अर्थ बच्चों को उत्पादन से संबंधित ऐसे लाभकारी व्यवसाय में लगाना है जिससे उनके स्वास्थ्य को खतरा हो तथा उनके विकास में बाधक हो। ये सिर्फ उद्योगों में लगे हुए बच्चों पर ही लागू नहीं होता है। ये उन तमाम छोटे-मोटे व्यवसायिक काम जो 18 वर्ष की कम आयु वाले बच्चों के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और नैतिक विकास में रूकावट डाले वो सब भी बालश्रम कानून के तहत आता है।
बाल श्रम अपने आप में एक सामाजिक कलंक है। ये समस्या सबसे पहले अन्र्तराष्टï्रीय स्तर पर 1924 मेें जेनेवा में उठायी गयी। इसी घोषणा पत्र में बच्चों के अधिकार को मान्यता देते हुए पांच सूत्री कार्यक्रम की घोषणा कर दी गई। साथ ही साथ बालश्रम को प्रतिबंधित भी कर दिया गया। 1989 में संयुक्त राष्टï्र के सदस्यों द्वारा बालश्रम को रोकने के लिए और दण्ड के प्रावधान को लेकर हस्ताक्षर किये गये।
भारत में बाल अधिकार
बाल अधिकार अधिनियम 1933, बाल रोजगार अधिनियम 1938, भारतीय कारखाना अधिनियम 1940 ऐसे कुछ प्रावधान बालश्रम को रोकने के लिये थे। जो स्वतंत्रता पूर्व बनाये गये थे और आज भी लागू हैं। स्वतंत्रता के बाद 1952 में पारित औद्योगिक विवाद अधिनियम में भी बाल श्रम निषेध कर दिया गया। संविधान के तहत ये सुनिश्चित किया गया कि 6 से 14 वर्ष तक की आयु वालेे सभी बच्चों को मुफत शिक्षा मिलेगी। ऐसे में किसी भी बच्चे को काम पर लगाना कानूनन जुर्म माना जायेगा। राज्य का यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि पैसे के लालच या कमी कि वजह किसी बच्चे क ो बालश्रम के लिये मजबूर न करे।
भारत में बाल श्रम की स्थिति
कई गैर सरकारी सक्रिय संगठनों के मुताबिक भारत में साल 2010 तक 6 करोड़ बाल मजदूर हैं। जिसमें 1 करोड़ बंधुआ मजदूर हैं, क्योंकि वो बंधुआ मजदूर के यहां पैदा हुए होते हैं। जिसमें 50 लाख ओद्योगिक कामों में लगे हुए हैं। राष्टï्रीय बाल अधिकार आयोग की वेबसाइट पर मौजूद 2001 के आकड़ों में बाल मजदूरों की संख्या 1.27 करोड़ है। देश में राष्टï्रीय बाल अधिकार आयोग के अलावा दिल्ली, बिहार और 9 राज्यों में ही बाल अधिकार आयोग है। जो पूरी तरह से सक्रिय नहीं हैं।
बाल श्रम के प्रभाव
चाय की हर छोटी दूकान पर गिलास धोने का काम और चाय देने का काम एक छोटू करता है। जिससे वह बहुत सारी चीजों से वंचित रह जाता है। शिक्षा, नैतिकता और समाजिकता जैसी महत्वपूर्ण चीजों से वो वाकिफ नहीं हो पाते हैं। बाल श्रम की वजह से गरीबी बढ़ी है। जो विकास में सबसे बड़ी बाधा है। अल्पायु में मौत या भयानक रोग से बच्चे चपेट में आ जाते हैं। आने वाली पीढ़ी को समस्याएं विरासत में मिलती हैं। देश का भविष्य इससे खराब होता है।
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