Monday, June 2, 2014

अनुच्छेद-370 लम्हों की खता , सदियों को सजा ॥॥॥॥॥

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का सबसे विवादित और विशेष अनुच्छेद है, जिसे आर्टिकल 370 भी कहते हैं। इसकी वजह

से राज्य जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों की तुलना में अलग से संवैधानिक छूट प्राप्त है। आजादी के बाद से लेकर अब तक ये

धारा भारतीय राजनीति में हड़कम्प मचाती रही है। पूर्व प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से ये धारा

तैयार की गयी थी। भारतीय संविधान में ये धारा अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 में है। इस

धारा का सबसे ज्यादा विरोध बीजेपी और अन्य राष्टï्रवादी दल करते रहें हैं। उनकी हमेशा से ये मांग रही है कि कश्मीर से

अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से खत्म किया जाये और पूरे देश में एक समान नागरिकता का संविधान लागू किया जाए। बीजेपी

ने तो इसे अपने हर चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल किया है।
1947 में अनुच्छेद 370 का खाका शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था जिनको पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू और कश्मीर के राजा हरि

सिंह ने कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। अब्दुल्ला चाहते थे कि धारा 370 स्थायी रूप से लागू हो। लेकिन नेहरू ने

इसे नकार दिया था। 1965 तक कश्मीर में राज्यपाल को सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था।

हालांकि उस समय नेहरू को छोड़कर लगभग सारे लोग इस अनुच्छेद के खिलाफ थे। भीमराव अम्बेडकर भी इससे नाखुश

थे। ये सिर्फ 10 सालों तक लागू किया गया था। जिसे बाद में एक खास वर्ग और वोट बैंक की राजनीति को साधने के चक्कर

में सरकारें बढ़ाती गयीं।

क्या विशेष है अनुच्छेद 370ï में ?

धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून

बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित कानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का

अनुमोदन चाहिये। इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण

राष्टï्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है। 1976 का शहरी भूमि कानून भी वहां लागू नहीं

होता है। इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का   अधि

कार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते। धारा 360 जिसके तहत वित्तीय

आपातकाल लगाने का प्रावधान है, लेकिन ऐसा कश्मीर में नहीं होता।

विशेष अधिकार -

जम्मू कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। उनका राष्टï्रध्वज अलग होता है। विधानसभा का कार्यकाल 6

वर्षों का होता है। वहां भारत के राष्टï्रध्वज या राष्टï्रीय प्रतीक का अपमान करने पर कोई अपराध नहीं माना जाता है। भारत के

सुप्रीम कोर्ट का आदेश राज्य में मान्य नहीं है। ससंद सिर्फ सीमित क्षेत्रों में ही कानून बना सकती है। जम्मू कश्मीर की महिला

अपने राज्य से बाहर शादी करती है तो उसे कश्मीर की नागरिकता गवांनी पड़ती है। लेकिन अगर वहीं वो किसी पाकिस्तान क

े नागरिक से शादी करती है तो उस पाकिस्तानी को वहां की नागरिकता मिल जायेगी। आरटीआई, आरटीई और कैग वहां

लागू नहीं है। एक मायने में भारत का कोई भी कानून वहां नहीं लागू होता है।  कश्मीर में महिलाओं पर शरियत लागू है। वहां

पंचायती राज नहीं है। चपरासी को 2500 रूपये ही मिलते हैं , हिंदू-सिख अल्पसख्यकों को 16 प्रतिशत आरक्षण भी नहीं प्राप्त

है। कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानी को भारत की नागरिकता भी मिल जाती है जबकि अन्य भारतीय वहां जमीन तक नहीं ले

सकता है।

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