Friday, July 18, 2014

हमारा पहला टकराव तंत्र से भाग -2


दिन भर इन्तजार करते हुए लगातार दिमाग एक बात सोचता रहता था कि इस देश का कानून वास्तव में अँधा है. पॉवर और सोर्स बाज़ी इसके दो नमूने हैं, जो इसे मजाक और काफी जटिल बनाते हैं. भारतीय पुलिस दुनिया के सबसे भ्रष्ट तंत्र में आती है इसका नमूना पुलिस ने इस मामले में भी पेश किया. जैसे ही थाना परिसर में मैं पहुंचा एक तीन तारे वाले ने मुझे धमकी देते हुए वहां से जाने को कहा, मेरे बाकी दोस्त रस्ते में थे जो पहुँच रहे थे. मेरे मिलने के निवेदन को भी उस दरोगा न ठुकरा दिया. धीरे धीरे हमारे दोस्तों की संख्या बढ़ रही थी. मामला उतना बाधा नही था जितना पुलिस वाले बोल रहे थे. मुझे गुस्सा इस बात की लग रही थी जो पुलिस ने बिना दुसरे पक्ष की बात सुने उन्हें मुलजिम बना कर ले आई थी. शाम ढल रही थी, एक दोस्त की मां भी वहीं आ गयी थी जो काफी परेशां थी. एकलौता बेटा जिससे सारी उम्मीदें ऊपर से लड़का पुलिस कस्टडी में इससे बुरा एक मां के लिए और क्या हो सकता है. एस ओ के आने इन्तजार हो रहा था जो कहीं बाहर निकले हुए थे. कुछ सिपहियों की काना फूसी से पता चला की उनके आते ही हो सकता है इन लोगों को छोड़ दिया जाये. एस ओ लगभग 8 बजे आये और उन्होंने ऊपरी दबाव का हवाला देते हुए अपनी बात रखी की रेखा जी मान नही रही हैं. लेकिन कुछ देर बाद एस ओ के जाते ही हमारे दोस्तों को छोड़ दिया गया. हम लोग काफी खुश थे और वहां से निकल पड़े. ये वक्त था जो काफी शुकून दे रहा था हम लोग खाना खाने निकले. खाना आर्डर करते ही विशाल का फ़ोन आया जो उठाने पर पता चला की थाने से फ़ोन आया है की सब लोग वापस आ जाओ. हम सब चकित थे फिर विशाल को मना करते हुए खाने पर जुट गये दिन भर की भूंख को शांत करने में. लेकिन जब नीतीश और नीरज लगातार फ़ोन करने लगे तो लगा शायद सच में बुलाया जा रहा है. खाना खा कर हम लोग महानगर थाने में पहुंचे जहाँ से एस. ओ. उन लोगों को रात भर गाजीपुर थाने में रुकने को बोल रहा था. पुलिस का कहना था वो सुबह 4 बजे उन्हें यहाँ से छोड़ देंगे. अब बचे हम तो हमने दरोगा से पूछा की हम भी यहाँ रुक सकते की नही तो वो बोले जैसी तुम्हारी इच्छा तो हम भी रुक गये. थाने में पहली बार वो भी बिना किसी जुर्म के एक खास पल को जीने की बेताबी मेरे दिल जरा सा भी खौफ नही चेहरे पर लगातार हंसी जो मेरे दोस्तों के भारी मन को हल्का कर रही थी. १२ बाई 4 के कमरे में हमे रात गुजारनी थी. कमरे में 3 से 4 कंप्यूटर थे, जो सब ऑन थे. एक कूलर और 3 कुर्सियां साथ में एक दरी जिसपर सोने की इजाज़त थी. संघर्ष और नाराजगी के इस लम्हे में भी मुझे मजा आ रहा था क्यूंकि मैं पाक साफ़ था फिर भी उन लोगों के साथ मैं था उनलोगों को भी मौज आ रही थी. पता नही क्यूँ आज क्रांति कारी होने का एहसास हो रहा था. भगत सिंह और चंद्रशेखर की याद रही थी. धीरज पाल को आज अरविन्द केजरीवाल की याद आ रही थी आज उन्हें पता चल रहा था की सिस्टम से लड़ना इतना आसान काम नही है. अचानक एक महिला पुलिस पर नजर पड़ी जो ड्यूटी पर थी. बमुश्किल एक थाने में 4 से ५ ही महिला पुलिस होती बाकी पुरुषों का ही बोलबाला होता है. उनका इन पुरुष साथियों के साथ काम करना काफी मुश्किल होता है ये उनके चेहरे को देखकर मुझे साफ़ पता चला रहा था. उन्हें कुर्शी पर ही सोना होता है और साथ ही साथ उन्हें अपने पुरुष सहकर्मी के मजाक भरी बातों को अवॉयड करना होता है. पुरुष पुलिस आपस में गाली गलौच और घटिया मजाक करते रहते हैं जो उन महिलाओं को मजबूरी में सुनना पड़ता है. ये काफी जटिल होता है जब आप किसी चीज को पसंद नही करते हैं और वही आपके सामने या साथ में घटित हो रहा हो. वैसे दुनिया के सबसे भ्रष्ट तंत्र से आपको अच्छे मजाक की उम्मीद भी नही होनी चाहिए. आज हम पांच लोग एक अलग ही कश्म्कस से गुजर रहे थे और पैसा और पॉवर की ताकत से रूबरू हो रहे थे. कोई जुर्म नही फिर भी फंस जाना युवाओं को उकसाता है. वो युवा चाहे कश्मीर के हों या फिर लखनऊ के हों. आज ये बात भी महसूस हो रही थी की बुरे वक्त कि चोट हमे बुरे कर्म की तरफ धकेलने के लिए जिम्मेदार भी हो सकती है. कश्मीर घटी के युवा क्यूँ बात को हल नही मानते हैं और बन्दूक से अपनी बात मनवाना चाहते हैं क्यूंकि उनकी आवाज को सुनने की जगह दबाने की कोशिश की गयी जो सरासर गलत है. अपने अधिकार की खातिर लड़ना बेमानी नही है. न जाने क्यूँ आज हम खुद को आतंकवादियों के करीब पा रहे थे. धीरे धीरे रात कट रही थी और हमारी सोच फैलती जा रही थी कभी हम महिला कर्मी की मजबूरी तो कभी उस धोखेबाज महिला कर्मी की कारगुजारी को कोस रहे थे. कुछ ख़ास लोगों को मौके पर खामोश रहना भी आज टीस रहा था मनमोहन सिंह की याद आ रही थी. फिर उस दिन का चक्र हमे समय की औकात का अंदाजा लगवा रहा था. माना हम तो पढ़े लिखे लोग हैं तो पुलिस हमे हल्के में नही ले रही थी लेकिन उन गरीबों के ये पुलिस क्या करती होगी इसका अंदाजा आज हम बखूबी समझ रहे थे. आखिर कार सुबह पिकनिक जैसा माहौल था जो किसी भी मामले को दरकिनार कर रहा था. बस बात वहां से निकलने की बची थी जो जल्द ही पूरी होने की उम्मीद थी. जैसे जैसे सूर्य अपनी रौशनी बड़ा रहा था वक्त आज़ाद होने का निकट आ रहा था क्यूंकि नियम भी 24 घंटे से ज्यादा रोकने के खिलाफ था. तो लगभग २:30 बजे एस. ओ. ने हमे वहां से जाने का आदेश दिया. हम सब में मनो ख़ुशी की लहर जैसे दौड़ पड़ी और भूख मानो अपने चरम पर आ गयी हम सब वहां से निकलते हैं. तो ये रही थाने में बिताया गया अपने आप में एक अनोखा पल जो तह ज़िन्दगी ज़हन में बना रहेगा. यादगार रात और यादगार पल जीवन को रोचक बनाते हैं और बार बार नही आते हैं.

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