Wednesday, July 9, 2014

हमारा पहला टकराव तंत्र से ..... भाग -1 


कहते हैं ज़िन्दगी में  समय के  गर्भ का कोई अल्ट्रासाउंड नही होता है. वक्त कब कौन सा करवट ले ले इसका हम अंदाजा तक नही लगा सकते हैं. हम कभी कभी कर कुछ और रहे होते हैं और घट कुछ और जाता है, साथ ही साथ छप कुछ और जाता है. हमारा प्लान कुछ और होता है और हमको करना कुछ और ही पड़ जाता है. लगभग 15 दिन की छुट्टी बिताकर गाँव से लखनऊ की कूच सुबह 8 बजे करते वक्त अपने दोस्तों को 11बजे तक मिलने का वादा करते हुए अपनी 160 किलोमीटर की मैराथन यात्रा शुरू कर देता हूँ. रास्ता बादलों और मामा के गुस्से की गरज में कट रही थी. मामला वाटर कूलर महंगा लगवा लेने का था साथ उनसे बिना पूछे हुए पैसे का पेमेंट भी कर दिया गया था जो लगभग 76000 था. जो मेरे हिसाब से भी महंगा था और उनका गुस्सा होना लाजिमी था. लेकिन मैं कुछ बोल नही सकता था क्यूंकि भाई को सिर्फ मामा ही डांट सकते थे और मेरे हिसाब से सही ही था. जैसे जैसे हम रामनगर से आगे निकले उनको गुस्सा घाघरा के बहाव में बह चुका था. लगभग 11:30 बजे हम लखनऊ पहुँच गये जहाँ दफ्तरों का निपटाते निपटाते 3 बज गये. खाना आर्डर करने से पहले २:38 पर उन लोगों की आखिरी कॉल आई थी और वो लोग मुझे कैमरे के साथ आने को बोल रहे थे. मैंने उनसे 30 मिनट का वक्त माँगा था. कहना खाने के बाद जब हम मामा से विदा लेकर रूम की तरफ बड़े और उनलोगों को कॉल करना शुरू किया तो उनके नंबर स्विच ऑफ बताने लगे थे. फिर मैंने उन चारो के नंबर पर कॉल किया लेकिन वो सब स्विच ऑफ की मुद्रा में थे. मैं कमरे की तरफ बढता जा रहा था और दिमाग में चीजों का मतलब निकाल रहा था की नंबर स्विच ऑफ क्यूँ जा रहा है. एकबारगी मुझे लगा की वो सब गिरफ्तार तो नही कर लिए गये. क्यूंकि वो लेडीज बाबू और उसके दो सहायक पिछली बार जब हम भी थे साथ में तो उनका टोन थोड़ा हाई था. जो बवाल करवा सकता था. मैं रूम के अन्दर गुसा तो लगा की मैं बहुत तन्हा हूँ यहाँ तो बहुत अकेला हूँ. बैग रखते हुए दिमाग को स्थिर करने की कोशिश कर रहा था जो हो नही रहा था. मैंने बिना कपड़े बदले विकास भवन का ऑटो पकड़ कर वहां पहुंचा वक्त था 4 बजे का बहुत कम लोग बचे थे जो अपनी दिन भर की बातों में मशगूल थे, लेकिन उनके दिमाग पर कोई थकावट नही थी क्यूंकि वो काम ही नही करते हैं. वहीं मिले सीडीओ के चपरासी ने बताया उन चार लड़कों को पुलिस गाजीपुर थाने में ले गयी है. मुझे जो अंदेशा था वही सन्देशा मिला. एक दोस्त जो काफी मददगार रहा और मेरे एक काल पर वो खुद और अपनी बाइक लेकर आ गया और हम थाना गाजीपुर के लिए निकल पड़े. वैसे अपने कसबे के थाने में हम स्चूली दिनों में घूम चुके हैं थाना देखने गये थे एक दोस्त के साथ कि कैसा होता है. आज दरोगा से बात करनी थी मन में हडबडाहट थी की क्या बोले. वहां पहुँचने पर एक सिपाही ने पुछा क्या काम है, तो हमने पूछ लिया दरोगा कौन है यहाँ का मुझे कुछ बात करनी है यहाँ के दरोगा से. दरोगा बोला हाँ बताओ क्या बात करनी है मैं हूँ यहाँ का दरोगा. विकास भवन से आप मेरे चार दोस्तों को पकड़ कर यहाँ लाये हैं. उसने बोला हाँ तुम कौन मैंने जवाब दिया और बोल दिया मैं मनोज तिवारी इन सबका दोस्त. मैंने पुछा क्या किया था जो आप इन्हें यहाँ ले आये. उसने कहा नेता बन रहे हैं और अब जेल जायेंगे. हमने कहा मिल सकते हैं, उसने कहा तुम जाओ नही तुम्हे भी बैठा देंगे, हमे क्यों? तुम्हे इतनी फिक्र जो है उनकी, हमने कहा अच्छा. दो दोस्तों को इन्फॉर्म करते हुए मैं बाहर आया और पैरवी की शुरुआत की. थाने का पहला मामला था मेरा जिसमें मुझे लीड भी करना था. घरवालों से मदद नही ले सकता था अपने दोस्तों से ही उम्मीद थी. हालाँकि मुझे ये पता था और मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ की उन्हें फंसाया जा रहा था. 

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