कब मिलेगी असल आज़ादी......
लाल किले का भाषण हो गया, हर सरकारी दफ्तरों और
स्कूलों में झंडा फहरा दिया गया, मिठाई और फूलों के साथ देशभक्ति के तराने भी बजा
लिए गये और हमने आज मना लिया आज़ादी का 68 वां जश्न. पर क्या ये सब एक दिखावा नही
लगता है? क्या हर कोई इस जश्न में मन लगा रहा है? नही आप लोगों को क्या लगता है?
सवाल मेरा नही है मेरी नजर का जवाब मिले तो ठीक है, नही मिलता है तो प्रश्न बना
रहेगा. अभी एक मेसेज आया है आजादी के मौके पर बम्पर छूट सीधे 50% पर ये किसके लिए
है. जिसके फ़ोन पर ये मेसेज आया है जो पहले वहां से पांच हज़ार से ज्यादा की खरीदारी
कर चूका है. क्या इन ऑफरों का फायदा गरीबों को नही मिलना चाहिए या वो आज़ाद आज भी
नही हैं. इंडिया वाले शाहरुख़ खान ने तो कह दिया की वो नया शब्द गढ़ रहे हैं. पर जो
असल में इंडिया वाले हैं जो कभी भी इस देश के लिए कुर्बान होने को तैयार हैं और
पहले भी इन्ही के कंधों से बन्दूक रखकर फायरिंग की जा चुकी है. क्या वो अभी इतना
सक्षम हैं जो अपने तिरेंगे की लहर में खुश हो सके. आखिर कबतक गरीबों को मौके नही
दिए जायेंगे या उन्हें नक्सली बनने को मजबूर किया जाता रहेगा. क्या वो लालकिले के
संबोधन से अपना वास्ता बना पा रहे हैं या सिर्फ उनके झंडा फहराने के पहले का
इंतजाम ही करेंगे. आये दिन अख़बारों में बलात्कार के मामले आते रहते हैं जो इस देश
में इस वक्त सक्रमण की तरह फैला हुआ है. लेकिन मैं और आप भी देख और समझ रहे होंगे
की बलात्कार जैसे वीभत्स मामले को हाई प्रोफाइल और लो प्रोफाइल के नजरिये से देखा
जा रहा है. ऐसे क्या न्याय की उम्मीद की जाये की आरोपी को फांसी होगी या वो बाहर
और बलात्कार करेगा. देश के किसान देशवासियों का पेट भरने में खुद पेट और पीठ एक
किये दे रहा है. उसके खाद और डीज़ल के भाव को बढ़ाकर शहरी विकास किया जा रहा है.
चीनी मिलों को ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है और किसानों को पैसा अभी तक नही
दिलाया गया. अब बताइए क्या आज़ादी है सिर्फ उन्ही के लिए जो झंडा खरीदकर अपनी कारों
में लगाकर चल सकते हैं. उच्चवर्ग अपनी सफलता को इतना ऊँचा कर चुका है जहाँ से नीचे
के लोग गूगल मैप की तरह नजर आ रहे हैं. नीचे और ज़मीन से जुढ़े लोग ऊपर वालों की तरफ
नजर गड़ाए टुकुर टुकुर देख रहे हैं की कब वो लोग ज़ूम बटन का इस्तेमाल करेंगे. तो हम
लोग भी आजादी मना लेते हैं. कपड़े वाला तिरंगा ही फहरा लेते. जय हिन्द .......
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