रामपुर की
रामलीला
हर साल कुंवार नवरातों में हम 7
लोगों की मंडली घर से नौ रात बाहर ही रहती थी. हम दो सगे भाई के आलावा हमारे चार
चचेरे भाई जिसमे एक बोल नही पाता था और वो सबसे बड़ा भी था, साथ ही एक अपने धर्म से
जिहाद किया हुआ शब्बीर. हम लोग 15 दिन पहले से ही पता लगाने लगते थे की कहाँ कहाँ
रामायण वीसीआर में चलेगा. क्यूंकि हम सभी भक्तों को अरुण गोविल वाला रामायण ही
पसंद था. उसके लिए चाहे हमे 3 किमी क्यों न जाना पड़े. स्कूलों की छुट्टी होने के
नाते हम सभियों को घर का काम भी करना पड़ता था. जिसे हम लोग बहुत फुर्ती में निपटा
देते थे. घर वाले काम भी खूब बताते थे. लेकिन हम रात भर जगने वाले उल्लुओं को उस
वक्त कोई विरोध नही सूझता था. हम सारा काम निपटा देते थे. नहाना और खाना भी समय से
ही करते थे. 7 बजते ही हम सब इक्कठा होने लगते थे. हर कोई बांस के डंडे के रूप में
अपना एक आत्मरक्षक हथियार रखता था. फुल पतलून और गमछा कंपल्सरी कपड़ों में होते थे.
बैठने के लिए एक-एक बोरा साथ लेकर जाना होता था. पखवारा तो चांदनी रात का होता था
लेकिन वापस आटे वक्त अँधेरा काफी हो जाता था जिसको कम करने के लिए हम सप्तऋषी
साइकिल के पुराने टायरों को जलाकर करते थे. ये टायर भी हर कोई जलता हुआ नही पकड़ कर
नही चल पाता था. ये काम शब्बीर को सौंपा जाता था. आगे कौन चलेगा और पीछे कौन चलेगा
ये भी एक सवाल होता था. हर कोई सबसे आगे और पीछे चलने में डरता था. आगे मैं तो
सबसे पीछे दिनेश जो बोल नही पाते थे चलते थे. ये दिक्कते जाते वक्त कम आते वक्त
ज्यादा आती थी. बगल वाले गाँव के रस्ते में एक जगह पुल टूटे होने की वजह से हमे
घुटने घुटने तक पानी से होकर जाना पड़ता था. शांत पानी में मछलियाँ पैर छुकर
गुदगुदी भी लगा जाती थी. हमारी पूरी टीम को राम के वनवास का इन्तजार रहता की कब
राम जंगल निकलेंगे. क्यूंकि तड़का वध के बाद कहीं लड़ाई ही नही हो रही होती थी.
चित्रकूट से कब भरत विदा हों और राम पंचवटी पहुंचे. इन सब में हमे सीरियल में रावन
का इन्तजार रहता था की कब लंकेश आकर सियाहरण करेंगे और युद्ध की शुरुआत होगी.
हनुमान के रोल में दारा सिंह जब लंका दहन करते हैं और पेड़ उखाड़ डालते थे. तो हम
लोगों जरा सा भी शक नही होता था. ऐसा कई बार मौका आया जब किसी वजह से वीसीआर नही
चल पाया और हम लोगों को उलटे पांव लौटना भी पड़ा. ऐसे मौके का फायदा हुआ रंगमंच
वाली रामलीलाओं को हम मजबूरी में वहां जाते थे. वहां नगाड़े की ताल और पंडित जी के
कांख कांख कर रामचरित पड़ने की स्टाइल बहुत बेकार लगती थी. कलाकारों की वाह्यात
अदाकारी और फूहड़ आउटलुक हमे झल्लाने पर मजबूर कर देते थे. एक बार तो हद तब हो गयी
जब दर्शक आरती के दृश्य देखने का इन्तजार कर रहे होते हैं और राम, लक्ष्मण और सीता
तीनो कलाकार मंच से गायब होते हैं. तभी उसी में कोई दर्शक लघुशंका करने जाता है.
उसे वहीं राम लखन और सिया बीडी पीते हुए मिल जाते हैं. वो वापस आकर कहता है सीता
जी बीडी पी रही हैं. अब पब्लिक भन्ना जाती है. सीता जी का किरदार निभा रहे खेलावन
को उसी में कोई ठलुआ एक थप्पड़ मार देता है. अब खेलावन अपना चीर हरण करके गुस्सा
जाते हैं. वैसे खेलावन इसके अलावा सबरी, तारा और कौशल्या के साथ-साथ कुछ राक्षसों
का भी किरदार निभाते हैं. कुल मिलाकर खेलावन रामपुर की रामलीला के काफी महत्वपूर्ण
यूँ कहें संजीवनी थे. राम किसी तरह सीता जी को मनाते हैं और आरती शुरू होती है.
वैसे रामपुर की रामलीला में सभी कलाकार स्थानीय होते हैं. अबतक की रामलीला में राम
और रावण का किरदार निभाने वाले कलकार नही बदले हैं. बाकी किसी की गरीबी, किसी का
स्वास्थ्य और किसी की अन्य जरूरतों ने उन्हें मजबूर किया है. यहाँ अच्छाई- बुराई
को पिछले १६ सालों से हरा देती है लेकिन यहाँ के लोग अभी भी 18वी शताब्दी में जीवन
यापन कर रहे हैं. ग्राम टंडवा महंथ और जिला श्रावस्ती का ये होनहार रामपुर अभी भी
रामलीला के किरदारों के साथ न्याय नही कर पा रहा है.
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