Friday, October 3, 2014

हिजाब(बुर्का) पहनने वाली मुस्लिम महिलाओं का शरीर गैर हिजाब वाली महिलाओं की अपेक्षा ज्यादा अच्छा दिखता है-
हिजाब अथवा सिर का दुपट्टा, प्राय: पश्चिम में समस्या के प्रतीक के तौर पर पेश किया जाता है- और बहुत से मुस्लिमो द्वारा इसे धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का चिन्ह माना जाता है.
 यूरोप में पिछले कुछ वर्षों से हिजाब का विरोध तीव्र हो गया है. चीन में सरकार ने हिजाब न पहनने वाली महिलाओं को पैसा तक देने की पेशकश की है. कनाडा प्रशासित क्यूबैक प्रान्त में एक बड़ी विपक्षी राष्ट्रवादी पार्टी की मांग है कि सरकारी कर्मचारियों के हिजाब और अन्य धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए. ये विरोध असफल जरूर हो गया लेकिन लगभग ७०% क्यूबैक नागरिकों ने इसका समर्थन किया.
फिर भी तीखी बहस में मुस्लिम महिलाओ की आवाज प्राय: हार जाती है. यूके की यूनिवर्सिटी वेस्टमिन्स्टर और मलेसिया की हेल्प यूनिवर्सिटी कॉलेज द्वारा एक साझा रिसर्च में ये पाया गया है कि ऐसी मुस्लिम महिलाएं जो हिजाब पहनती हैं सामान्यतया उनका शरीर ज्यादा अच्छा दिखता है. मीडिया के संदेशों में ख़ूबसूरती के मानक पर कम भरोसा करती हैं और बिना हिजाब वाली ऐसी महिलाओं को दिखावे के अनुसार कम महत्व मिलता है.
वरिष्ठ लेखक डॉ विरेन स्वामी शोध के विज्ञप्ति में कहते हैं, यद्यपि हमे नही मानना चाहिए की हिजाब मुस्लिम महिलाओं को नकारात्मक शारीरिक छवि से बचाता है, हमारे परिणाम बताते हैं कि हिजाब पहनने वाली कुछ महिलाओं के पूर्वानुमानित ख़ूबसूरती के आदर्श को नकार देती हैं.
शोध में 587 ब्रिटिश मुस्लिम महिलाओं ने भाग लिया. वे सभी लन्दन में रहती हैं, 18 से 70 साल तक की इन महिलाओं का बॉडी मास इंडेक्स रेट 15.56 से 35.84 किलोग्राम था जो उनके द्वारा पेश किये गये रिपोर्ट के मुताबिक था. 79% अविवाहित और 76% स्नातक की हुई थी. जिनमे 36% बंगाली या बंगलादेशी, 31% पाकिस्तानी, 10% भारतीय और अरब तथा अन्य देशों की थी. सभी ब्रिटेन की नागरिक थी.
शोध का पहला और बहुत ही आसान सा सवाल था. एक इस्लामिक हिजाब को आपने कितना पहना? उत्तर 5 के पैमाने में देना था. जिसमे 1 = कभी नही और 5=हमेशा . उत्तर में 218 या 37% महिलाओं ने हिजाब कभी न पहनने का दावा किया. वहीं 369 महिलाओं ने हमेशा हिजाब पहनने की बात कही.
प्रतिभागियों के शारीरिक छवि को जांचने के लिए शोधकर्ता ने उनका वजन करवाया और इसकी तुलना उनके पसंद के आदर्श वजन से किया. उन्होंने दस विभिन्न महिलाओं की फोटोग्राफ जो अलग अलग भार वर्ग की थी को उन महिलाओं को दिया. सारी तस्वीरें ग्रे थी जिसमे रंगभेद और नस्ल का कोई विवाद नही था.
प्रतिभागियों को ऐसी दोनों तस्वीरें चूस करनी थी जो उनके शरीर से काफी मैच करती हों तथा उनको भी जैसा शरीर वो चाहती हैं. प्रतिभागियों के लिए पैमाना था 1=फिगर विथ लोवेस्ट bmi और 10=फिगर विथ हाईएस्ट bmi. इनमे से वें प्रतिभागी जो हिजाब पह्न्नते थे, शोधकर्ता के अनुसार अपने भार से ज्यादा अंतर के भार को पसंद करते हैं. धार्मिकता से ऊपर उन्होंने अपने शरीर को रखा जो कि उम्दा था.
अंत में शोधकर्ता का निष्कर्ष था की हिजाब पहनने से कोई धार्मिक भावना जाग्रति नही हो जाती है. उसने इस चीज को जानने के लिए एक अन्य शोध की जरूरत मानी है. जो अगले महीने तक आएगी.

सौजन्य से:- क्यूजेड.कॉम  अनुवाद – मनोज तिवारी  
रामपुर की रामलीला

हर साल कुंवार नवरातों में हम 7 लोगों की मंडली घर से नौ रात बाहर ही रहती थी. हम दो सगे भाई के आलावा हमारे चार चचेरे भाई जिसमे एक बोल नही पाता था और वो सबसे बड़ा भी था, साथ ही एक अपने धर्म से जिहाद किया हुआ शब्बीर. हम लोग 15 दिन पहले से ही पता लगाने लगते थे की कहाँ कहाँ रामायण वीसीआर में चलेगा. क्यूंकि हम सभी भक्तों को अरुण गोविल वाला रामायण ही पसंद था. उसके लिए चाहे हमे 3 किमी क्यों न जाना पड़े. स्कूलों की छुट्टी होने के नाते हम सभियों को घर का काम भी करना पड़ता था. जिसे हम लोग बहुत फुर्ती में निपटा देते थे. घर वाले काम भी खूब बताते थे. लेकिन हम रात भर जगने वाले उल्लुओं को उस वक्त कोई विरोध नही सूझता था. हम सारा काम निपटा देते थे. नहाना और खाना भी समय से ही करते थे. 7 बजते ही हम सब इक्कठा होने लगते थे. हर कोई बांस के डंडे के रूप में अपना एक आत्मरक्षक हथियार रखता था. फुल पतलून और गमछा कंपल्सरी कपड़ों में होते थे. बैठने के लिए एक-एक बोरा साथ लेकर जाना होता था. पखवारा तो चांदनी रात का होता था लेकिन वापस आटे वक्त अँधेरा काफी हो जाता था जिसको कम करने के लिए हम सप्तऋषी साइकिल के पुराने टायरों को जलाकर करते थे. ये टायर भी हर कोई जलता हुआ नही पकड़ कर नही चल पाता था. ये काम शब्बीर को सौंपा जाता था. आगे कौन चलेगा और पीछे कौन चलेगा ये भी एक सवाल होता था. हर कोई सबसे आगे और पीछे चलने में डरता था. आगे मैं तो सबसे पीछे दिनेश जो बोल नही पाते थे चलते थे. ये दिक्कते जाते वक्त कम आते वक्त ज्यादा आती थी. बगल वाले गाँव के रस्ते में एक जगह पुल टूटे होने की वजह से हमे घुटने घुटने तक पानी से होकर जाना पड़ता था. शांत पानी में मछलियाँ पैर छुकर गुदगुदी भी लगा जाती थी. हमारी पूरी टीम को राम के वनवास का इन्तजार रहता की कब राम जंगल निकलेंगे. क्यूंकि तड़का वध के बाद कहीं लड़ाई ही नही हो रही होती थी. चित्रकूट से कब भरत विदा हों और राम पंचवटी पहुंचे. इन सब में हमे सीरियल में रावन का इन्तजार रहता था की कब लंकेश आकर सियाहरण करेंगे और युद्ध की शुरुआत होगी. हनुमान के रोल में दारा सिंह जब लंका दहन करते हैं और पेड़ उखाड़ डालते थे. तो हम लोगों जरा सा भी शक नही होता था. ऐसा कई बार मौका आया जब किसी वजह से वीसीआर नही चल पाया और हम लोगों को उलटे पांव लौटना भी पड़ा. ऐसे मौके का फायदा हुआ रंगमंच वाली रामलीलाओं को हम मजबूरी में वहां जाते थे. वहां नगाड़े की ताल और पंडित जी के कांख कांख कर रामचरित पड़ने की स्टाइल बहुत बेकार लगती थी. कलाकारों की वाह्यात अदाकारी और फूहड़ आउटलुक हमे झल्लाने पर मजबूर कर देते थे. एक बार तो हद तब हो गयी जब दर्शक आरती के दृश्य देखने का इन्तजार कर रहे होते हैं और राम, लक्ष्मण और सीता तीनो कलाकार मंच से गायब होते हैं. तभी उसी में कोई दर्शक लघुशंका करने जाता है. उसे वहीं राम लखन और सिया बीडी पीते हुए मिल जाते हैं. वो वापस आकर कहता है सीता जी बीडी पी रही हैं. अब पब्लिक भन्ना जाती है. सीता जी का किरदार निभा रहे खेलावन को उसी में कोई ठलुआ एक थप्पड़ मार देता है. अब खेलावन अपना चीर हरण करके गुस्सा जाते हैं. वैसे खेलावन इसके अलावा सबरी, तारा और कौशल्या के साथ-साथ कुछ राक्षसों का भी किरदार निभाते हैं. कुल मिलाकर खेलावन रामपुर की रामलीला के काफी महत्वपूर्ण यूँ कहें संजीवनी थे. राम किसी तरह सीता जी को मनाते हैं और आरती शुरू होती है. वैसे रामपुर की रामलीला में सभी कलाकार स्थानीय होते हैं. अबतक की रामलीला में राम और रावण का किरदार निभाने वाले कलकार नही बदले हैं. बाकी किसी की गरीबी, किसी का स्वास्थ्य और किसी की अन्य जरूरतों ने उन्हें मजबूर किया है. यहाँ अच्छाई- बुराई को पिछले १६ सालों से हरा देती है लेकिन यहाँ के लोग अभी भी 18वी शताब्दी में जीवन यापन कर रहे हैं. ग्राम टंडवा महंथ और जिला श्रावस्ती का ये होनहार रामपुर अभी भी रामलीला के किरदारों के साथ न्याय नही कर पा रहा है.      
रामपुर की रामलीला

हर साल कुंवार नवरातों में हम 7 लोगों की मंडली घर से नौ रात बाहर ही रहती थी. हम दो सगे भाई के आलावा हमारे चार चचेरे भाई जिसमे एक बोल नही पाता था और वो सबसे बड़ा भी था, साथ ही एक अपने धर्म से जिहाद किया हुआ शब्बीर. हम लोग 15 दिन पहले से ही पता लगाने लगते थे की कहाँ कहाँ रामायण वीसीआर में चलेगा. क्यूंकि हम सभी भक्तों को अरुण गोविल वाला रामायण ही पसंद था. उसके लिए चाहे हमे 3 किमी क्यों न जाना पड़े. स्कूलों की छुट्टी होने के नाते हम सभियों को घर का काम भी करना पड़ता था. जिसे हम लोग बहुत फुर्ती में निपटा देते थे. घर वाले काम भी खूब बताते थे. लेकिन हम रात भर जगने वाले उल्लुओं को उस वक्त कोई विरोध नही सूझता था. हम सारा काम निपटा देते थे. नहाना और खाना भी समय से ही करते थे. 7 बजते ही हम सब इक्कठा होने लगते थे. हर कोई बांस के डंडे के रूप में अपना एक आत्मरक्षक हथियार रखता था. फुल पतलून और गमछा कंपल्सरी कपड़ों में होते थे. बैठने के लिए एक-एक बोरा साथ लेकर जाना होता था. पखवारा तो चांदनी रात का होता था लेकिन वापस आटे वक्त अँधेरा काफी हो जाता था जिसको कम करने के लिए हम सप्तऋषी साइकिल के पुराने टायरों को जलाकर करते थे. ये टायर भी हर कोई जलता हुआ नही पकड़ कर नही चल पाता था. ये काम शब्बीर को सौंपा जाता था. आगे कौन चलेगा और पीछे कौन चलेगा ये भी एक सवाल होता था. हर कोई सबसे आगे और पीछे चलने में डरता था. आगे मैं तो सबसे पीछे दिनेश जो बोल नही पाते थे चलते थे. ये दिक्कते जाते वक्त कम आते वक्त ज्यादा आती थी. बगल वाले गाँव के रस्ते में एक जगह पुल टूटे होने की वजह से हमे घुटने घुटने तक पानी से होकर जाना पड़ता था. शांत पानी में मछलियाँ पैर छुकर गुदगुदी भी लगा जाती थी. हमारी पूरी टीम को राम के वनवास का इन्तजार रहता की कब राम जंगल निकलेंगे. क्यूंकि तड़का वध के बाद कहीं लड़ाई ही नही हो रही होती थी. चित्रकूट से कब भरत विदा हों और राम पंचवटी पहुंचे. इन सब में हमे सीरियल में रावन का इन्तजार रहता था की कब लंकेश आकर सियाहरण करेंगे और युद्ध की शुरुआत होगी. हनुमान के रोल में दारा सिंह जब लंका दहन करते हैं और पेड़ उखाड़ डालते थे. तो हम लोगों जरा सा भी शक नही होता था. ऐसा कई बार मौका आया जब किसी वजह से वीसीआर नही चल पाया और हम लोगों को उलटे पांव लौटना भी पड़ा. ऐसे मौके का फायदा हुआ रंगमंच वाली रामलीलाओं को हम मजबूरी में वहां जाते थे. वहां नगाड़े की ताल और पंडित जी के कांख कांख कर रामचरित पड़ने की स्टाइल बहुत बेकार लगती थी. कलाकारों की वाह्यात अदाकारी और फूहड़ आउटलुक हमे झल्लाने पर मजबूर कर देते थे. एक बार तो हद तब हो गयी जब दर्शक आरती के दृश्य देखने का इन्तजार कर रहे होते हैं और राम, लक्ष्मण और सीता तीनो कलाकार मंच से गायब होते हैं. तभी उसी में कोई दर्शक लघुशंका करने जाता है. उसे वहीं राम लखन और सिया बीडी पीते हुए मिल जाते हैं. वो वापस आकर कहता है सीता जी बीडी पी रही हैं. अब पब्लिक भन्ना जाती है. सीता जी का किरदार निभा रहे खेलावन को उसी में कोई ठलुआ एक थप्पड़ मार देता है. अब खेलावन अपना चीर हरण करके गुस्सा जाते हैं. वैसे खेलावन इसके अलावा सबरी, तारा और कौशल्या के साथ-साथ कुछ राक्षसों का भी किरदार निभाते हैं. कुल मिलाकर खेलावन रामपुर की रामलीला के काफी महत्वपूर्ण यूँ कहें संजीवनी थे. राम किसी तरह सीता जी को मनाते हैं और आरती शुरू होती है. वैसे रामपुर की रामलीला में सभी कलाकार स्थानीय होते हैं. अबतक की रामलीला में राम और रावण का किरदार निभाने वाले कलकार नही बदले हैं. बाकी किसी की गरीबी, किसी का स्वास्थ्य और किसी की अन्य जरूरतों ने उन्हें मजबूर किया है. यहाँ अच्छाई- बुराई को पिछले १६ सालों से हरा देती है लेकिन यहाँ के लोग अभी भी 18वी शताब्दी में जीवन यापन कर रहे हैं. ग्राम टंडवा महंथ और जिला श्रावस्ती का ये होनहार रामपुर अभी भी रामलीला के किरदारों के साथ न्याय नही कर पा रहा है.      

Sunday, September 28, 2014

तालाब और गोमती नदी

दूर कहीं वो मनचला गोमती में पत्थरों की रोरियां फेंकता हुआ,
डब-डब चंचल ध्वनियों से खुश हो ले रहा था,
आज वो घर से गुस्सा हो गया था,
न भरपेट था न ही खाली,
पर आज उसे थाली की जगह भरपूर मिली थी गाली,
पूरा दिन इधर उधर मानसिक उलझनों के साथ,
भटकता हुआ शांत घासों में सिमटा बैठा था वो,
आज गोमती से उस तालाब से जुड़ रहा था वो ,
गाँव का वो तालाब,
जहाँ बिता चुका है वो अपना बचपन,
था किनारों से हरियाली का दोआब,
इस तालाब में पहले बहुत नहाया था वो,
बेर्रा केवलगट्टा बहुत खाया था वो,
पहलीबार मछली भी तो यहीं पकड़ी थी उसने,
भैंसों के नहलाने के बहाने कई बार खुद भी नहाया था वो,
एक बार तो डूबते-डूबते बचा था वो,
छन्नू, पिंटू और भुल्ले ने ही तो बचाया था उसे,
याद उन सबकी याद,
आज बहुत एक बार फिर आ रही है,
न तो इस शहर में चैन है,
और न ही वो तालाब का किनारा,
जिसके किनारे बैठ कर कुमार को मिलता सहारा,
यहाँ भी एक सहारा है,
जो रोगियों से हर भरा है,
बड़े वाले मामा को यही तो दिखाया था,
एक महीने तक सांसों से लड़े थे वो,
आखिर में घर जाकर प्राण तो गवांये थे,
सत्य तो यही है जीवन है तो मरण भी है.
पर क्या गोमती भी मर जाएगी,
गंदे नालों के गंदे पानियों से,
पोलीथीन की बजबजाहट से,
घरों से निकलने वाले कूड़े और कचरे से,
गोमती नदी गमजदा और लाचार लग रही है,
बहाव तो है ही नही ऊपर से बदबू,
लोग इसमें नहाये कैसे, एक गोता लगाये कैसे,
काश ये मेरा तालाब होता,
अभी मार लेता इसमें एक गोता,
सुना है बड़े-बड़े लोग इसे साफ़ करायेंगें,
तो भैया गोमती नदी के भी अच्छे दिन आएंगे,
अच्छा वसुधे अब जाता हूँ,
फिर गुस्से में किसी और दिन आता हूँ.


Wednesday, August 27, 2014

मैं और वो शेर ......
पठारी क्षेत्र, नदी जो नेपाल से भारतीय सीमा में प्रवेश करती है, घना जंगल और उसका राजा शेर भी और अन्य छोटे जानवर जंगली जो आज भी सुहेलवा रेंजरी में पाए जाते हैं. पिताजी की पोस्टिंग वही थी वो वनाधिकारी थे. माता जी की मौत के बाद हम दोनों भाई-बहन अब पिताजी के साथ ही रहते थे. मेरी 10 और मेरी बहन जो मुझसे 3 साल छोटी थी. पिताजी रोज सुबह ड्यूटी पर चले जाते थे और हम दोनों भाई-बहन रसोइया भोलाराम और सुरक्षा के लिए चौकीदार श्याम सिंह के साथ पूरा दिन घर पर रहते थे. भोला राम रोजाना पानी भरने झरने के पास वाले कुएं पर जाया करते थे. मैं ऊबता था और भोला राम के साथ चलने की जिद करता लेकिन भोला राम हमे साथ इसलिए नही ले जाते की कैसे वो एक हाथ में बाल्टी पकड़ेंगे और कैसे मुझे गोद लेंगे. साथ ही साथ पिताजी का आदेश भी नही था. श्याम सिंह भी कभी-कभी पानी ले आया करते थे. उस दिन श्याम सिंह पिताजी के पास काम से गये हुए थे, घर पर हम भाई-बहन और भोला राम थे. भोला राम पानी लेने जाने वाले थे तो मैंने उनसे कहा की आज मुझे अपने साथ ले चलो पिताजी को पता नही चलेगा. भोलाराम ने बाल्टी और घर पर बहन अकेली पड़ जाएगी का हवाला देकर मुझे साथ नही ले गये. मैं मन मारकर के दरवाजे पर बैठ गया. भोला राम पानी भर कर देर तक जब वापस नही लौटे तो हमे चिंता होने लगी. हम दोनों काफी डर रहे थे, आखिर कुछ देर बाद जब श्याम सिंह घर वापस आये तो हमारी पूरी बात सुनने के वो कुएं की तरफ दौड़े मैं उनके पीछे निकल पड़ा. कुँए के पास जब हम पहुंचे तो हमने देखा की भोला राम और शेर दोनों कुएं में पड़े हैं. शेर मर चूका था पर भोला राम जिंदा थे. काफी मशक्कत के बाद श्याम सिंह ने भोलाराम को बाहर निकाला. भोला राम ने इस लड़ाई में अपने एक हाथ का पंजा लगभग गवां दिया था. पूछने पर भोला राम बोले की प्यासा शेर अचानक उनके सामने आ खड़ा हुआ. मुझे देखकर शायद वो अपनी प्यास भूलकर भूखा हो गया और मेरी ओर तेजी से बड़ा. अपनी ओर तेजी से उसे आते देख मैं डर तो रहा ही था लेकिन मेरे पास सिर्फ बाल्टी थी, जो मैंने उसके मुहं पर तेजी से दे मारा घायल शेर ने मेरे ऊपर जबर्दस्त वार किया. फिर मैंने एक हाथ से उसकी गर्दन पकड़ कर अपने साथ सीधे कुएं में कूद गया. जहाँ उसके मुंह को मैंने पानी के अंदर तबतक डुबोये रखा जबतक वो मर नही गया, इसी लड़ाई में मैंने अपना ये हाथ खो दिया. साल भर बाद जब भोला राम का हाथ ठीक हो गया जो अब पहले जैसा नही था. लेकिन मैं उन हाथों को आज जब भी छूता तो मुझे ये अनुभूति होती है कि ये वही हाथ हैं जो किसी शेर के मुहं जा घुसे थे.

Monday, August 18, 2014

सोशल मीडिया और हमारे रिश्ते...

एक जमाना था जब हमारे या तो स्कूली दोस्त होते थे या मोहल्ले वाले दोस्त होते थे. उनकी संख्या लगभग 4 से 5 होती थी. स्कूल वाले दोस्त हमारे साथ तब होते थे जब हम क्लास में साथ में पढ़ते थे या फिर इंटरवल में खेलते थे. मोहल्ले वाले दोस्त जो होते थे उनके साथ तो तितलियाँ पकड़ना लुकाछिपी खेलना और गर्मी की छुट्टियों में साथ में आम खाना और दिन भर धमा चौकड़ी में हम लगे रहते थे. ऐसे में कभी उनके घर का तो कभी हमारे घर का सीसा भी टूट जाया करता था. अब क्या है अब भाई सोशल मीडिया का जमाना है. फोटो खींचा फीलिंग, टैगिंग और कैप्शन दिया और कर दिया स्टेटस अपडेट और जाहिर कर दी दोस्ती. लेकिन क्या ये दोस्ती दिखाने का सही तरीका है. शायद सबकुछ ठीक है पर वो बात कहाँ नैसेर्गिगता और दिल का जुड़ाव शायद ही नजर आता है. हिन्दुस्तान की एक खबर के मुताबिक सोशल मीडिया के रिश्ते महज एक दिखावा है लोग सिर्फ दिखावा करते हैं. जो लोग अपने दोस्तों के तस्वीरों को अपनी प्रोफाइल पर शेयर करते हैं, उसमे भी प्राकृतिकता नही होती है. शोध के अनुसार टैग करना, लाइक करना और कमेंट करना ये बनावटी ज्यादा और सच कम होता है. लोग दिल से इसे एक्सेप्ट नही कर पाते हैं पर जब उन्हें कोई टैग कर देता है और बेस्ट बडी लिख देता है तो जैसे जबरदस्ती उनसे लाइक या कमेंट मांग रहा हो. ये बात दोस्ती के साथ साथ प्यार करने वाले कपल भी करते हैं. यहाँ तक लोग अपने गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड की तस्वीरे भी दिखावे की खातिर पोस्ट करते जिससे उनके गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड को ये यकीन रहे की वो उन्हें बेहद प्यार करते हैं. जहाँ तक मुझे लगता है तो ये शोध एक हद तक ये बात सही साबित करती है. मैंने ऐसे कई लोगों को जनता हूँ जो ऐसा करते हैं वो फेसबुक पर बहुत ही लंगोटिया यार हैं लेकिन अंतर्मन से एक दुसरे को बिलकुल भी पसंद नही करते हैं. मैंने तो कईयों को ये कहते भी सुना है की मुझे यार उसको टैग, कमेंट और लाइक सिर्फ दुनिया को दिखाने की खातिर करना पड़ता है. इसका प्रभाव भी आपको कई बार देखने को मिल जायेगा जब आप अपने किसी दोस्त को टैग करेंगे और किसी को नही करेंगे तो वो वर्चुअल दुनिया की ये खुन्नस रियल दुनिया में निकलने लगता है. एक खास फीलिंग लाने के लिए हमे अपने दोस्तों के साथ ये दिखावा करना पड़ता है. लोग फेसबुक पर इन सारी चीजों को नोटिस करते हैं रहते हैं. जो हमारे दोस्ती बनने और बिगड़ने में एक महती भूमिका ऐडा करता है. फेसबुक से भी हमे कई लोगों की दोस्ती की हद का पता लगा सकते हैं और लगाते भी रहते हैं. बहुत लोग तो ये भी कहते आपको मिल जायेंगे की आजकल तुम उसकी फोटो पर बहुत कमेंट और लाइक दाग रहे हो. ऐसे ही तमाम वाकये को समेटे ये वर्चुअल दुनिया दोस्ती के मायने को प्रभावित करती है. आशा आप टैग, लाइक और कमेंट के मोहताज़ न होकर अपने रिश्ते को बेहतर बनाते रहेंगे और उसमे फीलिंग बरकरार रखेंगे..... 

Friday, August 15, 2014

कब मिलेगी असल आज़ादी......

लाल किले का भाषण हो गया, हर सरकारी दफ्तरों और स्कूलों में झंडा फहरा दिया गया, मिठाई और फूलों के साथ देशभक्ति के तराने भी बजा लिए गये और हमने आज मना लिया आज़ादी का 68 वां जश्न. पर क्या ये सब एक दिखावा नही लगता है? क्या हर कोई इस जश्न में मन लगा रहा है? नही आप लोगों को क्या लगता है? सवाल मेरा नही है मेरी नजर का जवाब मिले तो ठीक है, नही मिलता है तो प्रश्न बना रहेगा. अभी एक मेसेज आया है आजादी के मौके पर बम्पर छूट सीधे 50% पर ये किसके लिए है. जिसके फ़ोन पर ये मेसेज आया है जो पहले वहां से पांच हज़ार से ज्यादा की खरीदारी कर चूका है. क्या इन ऑफरों का फायदा गरीबों को नही मिलना चाहिए या वो आज़ाद आज भी नही हैं. इंडिया वाले शाहरुख़ खान ने तो कह दिया की वो नया शब्द गढ़ रहे हैं. पर जो असल में इंडिया वाले हैं जो कभी भी इस देश के लिए कुर्बान होने को तैयार हैं और पहले भी इन्ही के कंधों से बन्दूक रखकर फायरिंग की जा चुकी है. क्या वो अभी इतना सक्षम हैं जो अपने तिरेंगे की लहर में खुश हो सके. आखिर कबतक गरीबों को मौके नही दिए जायेंगे या उन्हें नक्सली बनने को मजबूर किया जाता रहेगा. क्या वो लालकिले के संबोधन से अपना वास्ता बना पा रहे हैं या सिर्फ उनके झंडा फहराने के पहले का इंतजाम ही करेंगे. आये दिन अख़बारों में बलात्कार के मामले आते रहते हैं जो इस देश में इस वक्त सक्रमण की तरह फैला हुआ है. लेकिन मैं और आप भी देख और समझ रहे होंगे की बलात्कार जैसे वीभत्स मामले को हाई प्रोफाइल और लो प्रोफाइल के नजरिये से देखा जा रहा है. ऐसे क्या न्याय की उम्मीद की जाये की आरोपी को फांसी होगी या वो बाहर और बलात्कार करेगा. देश के किसान देशवासियों का पेट भरने में खुद पेट और पीठ एक किये दे रहा है. उसके खाद और डीज़ल के भाव को बढ़ाकर शहरी विकास किया जा रहा है. चीनी मिलों को ब्याज मुक्त ऋण दिया जा रहा है और किसानों को पैसा अभी तक नही दिलाया गया. अब बताइए क्या आज़ादी है सिर्फ उन्ही के लिए जो झंडा खरीदकर अपनी कारों में लगाकर चल सकते हैं. उच्चवर्ग अपनी सफलता को इतना ऊँचा कर चुका है जहाँ से नीचे के लोग गूगल मैप की तरह नजर आ रहे हैं. नीचे और ज़मीन से जुढ़े लोग ऊपर वालों की तरफ नजर गड़ाए टुकुर टुकुर देख रहे हैं की कब वो लोग ज़ूम बटन का इस्तेमाल करेंगे. तो हम लोग भी आजादी मना लेते हैं. कपड़े वाला तिरंगा ही फहरा लेते. जय हिन्द .......