Saturday, October 17, 2015

इंडियन सुपर लीग और भारतीय फुटबॉल का भविष्य

क्रिकेट के दीवाने इस देश में किसी अन्य खेल को उतना तवज्जो नही मिलती चाहे वो दुनिया का सबसे चहेता खेल फुटबॉल ही क्यूँ न हो. लेकिन जब से फुटबॉल के लीग संस्करण की शुरुआत इंडियन सुपरलीग के तौर पर हुई है तब से मानो सोये हुए भारतीय फुटबॉल प्रेमी जग गये हों. ये तो रही बात फुटबॉल के प्रेमियों की इस खेल के प्रति झुकाव की. लेकिन अब जो बात हम आपको बताने जा रहे हैं वह है आईएसएल से भारतीय फुटबॉल के जीर्नौद्धार की.
जैसा की भारतीय फुटबॉल टीम दुनिया में उतनी जानी मानी नही है या ये कहें कि हम इस खेल में नौसिखिया हैं. लेकिन एशिया महाद्वीप में अन्य टीमों के मुकाबले हमारी पोजीशन थोड़ी ठीक थक ही है. आईएसएल की शुरुआत पिछले साल आईपीएल के तर्ज पर शुरू हुई थी. बॉलीवुड और क्रिकेट बड़े खिलाड़ियों और कॉर्पोरेट घरानों ने इसमें अपनी-अपनी टीमें खरीदी हैं.
सचिन, गांगुली, धोनी क्रिकेट से और अभिषेक बच्चन, ऋतिक रोशन जैसे सितारों ने इसमें टीम खरीदकर इसे लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई है.
आईएसएल में बहुत सारे विदेशी खिलाड़ी भी भाग लेते हैं जिसकी वजह से भारतीय फुटबॉल का नाम पूरी दुनिया में हुआ है. विदेशी खिलाडियों के शामिल होने से भारत के उभरते हुए युवा खिलाड़ियों को भविष्य में अच्छा खिलाड़ी बनने में मदद मिलेगी. साथ ही बहुत सारे कोचिंग स्टाफ भी विदेशी हैं जो बड़े-बड़े क्लबों में कोच की भूमिका निभा रहे हैं. उनके आईएसएल में आने से देश नए खिलाडियों विश्वस्तर की जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी.
विदेशी खिलाडियों में क्लू उचे, हेल्डर पोस्टीगा,  गुस्तावो डॉस सैंटॉस, इलानो और रोबर्टो कार्लोस जैसे बेहतरीन खिलाड़ी अब इस लीग से जुड़े हुए हैं. इनके साथ में भारतीय खिलाडियों को बहुत कुछ सीखने को मिलेगा. जो शायद आईएसएल के बगैर सम्भव न हो पाता.
कोचिंग और अन्य स्टाफ में जीको जो, डेविड प्लाट, सीजर फ्लेसिय्स और पीटर टेलर जैसे कोचिंग स्टाफ की मौजूदगी से इसका सीधा फायदा भारतीय खिलाड़ियों को होगा.
पहले सीजन में मिली अपार सफलता से आईएसएल अपने दुसरे सीजन में भी काफी रोमांचक मुकाबलों के होने से इसका व्यवसायीकरण काफी बड़ गया है. जो इसके आगे भी जारी रहने की उम्मीद जगाता है. इससे भारतीय फुटबॉल का भविष्य और चमकेगा और ये किसी सपने के हकीकत होने से कम नही होगा. जो हर घर में फुटबॉल पहुंचा सकता है.




जिया हो बिहार के लाला...... बिहार चुनाव बहुतों का सबकुछ लगा है दांव पर

जैसा की शीर्षक से स्पष्ट है कि बिहार के चुनाव में कुछ न कुछ अप्रत्याशित होने वाला है, जो इस बिहार का भविष्य बदलकर रख देगा. इस चुनाव बिहार के ही नही देश के कई बड़े नेताओं का सबकुछ दांव पर लगा है. जिनमे खास लोगों में स्वयं भारत के प्रधानमन्त्री मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश, लालू यादव, जीतन राम मांझी और रामविलास पासवान जो केंद्र में मंत्री भी हैं. ऐसे में बिहार की तरफ पूरा देश मुहं उठाये ताक रहा है.  
बिहार एक ऐसा राज्य है, जो देश की राजनैतिक में हमेशा अपना अलग ही स्थान बनाये रखता है. वास्तव में ये राज्य देश के अन्य राज्यों की तुलना में बहुत ज्यादा पिछड़ेपन का शिकार रहा है. यहाँ इतनी गरीबी है कि यहाँ के लोग दूसरे प्रदेशों में जाकर मजदूरी करके जीवनयापन करने को मजबूर हैं. इस वक्त बिहार में विधानसभा चुनाव का मौसम चल रहा है और बिहार ने हमेशा से ही देश की राजनीति में अपने अहमियत को साबित किया है. पूरे देश की नजर इस वक्त बिहार की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा उसका इन्तजार कर रहे हैं. प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की प्रतिष्ठा इस चुनाव में दांव पर लगी हुई है. बिहार राज्य की अपनी खासियत है कि वहां की जनता किस तरह जनाधार दे दे ये कोई हवा में नही कह सकता है. गरीबी और अशिक्षा होने के नाते बिहार के लोग जातिवाद से काफी घिरे हुए हैं और इस मुद्दे को यहाँ की राजनीति में काफी निर्णायक पक्ष माना जाता है. यहाँ की सबसे पिछड़ी जाती महादलित है और सबसे अगड़ी जाति में भूमिहार आते हैं. नीतीश कुमार और लालू यादव ने बिहार में बीजेपी को रोकने के लिए सबसे बड़ा और अकल्पनीय महागठबंधन करके सियासत के सारी चाल ही पलट दी है. एक ज़माने में बीजेपी के साथ मिलकर लालू यादव की सत्ता को जंगलराज कहकर उखाड़ फेंका था. लेकिन सुशासन बाबू नीतीश की लोकसभा चुनावों में बीजेपी के नरेंद्र मोदी को पीएम का उम्मीदवार बनाने की वजह से बीजेपी से अपना अलगाव कर लिया. लेकिन लोकसभा चुनाव में मिली अपार सफलता के बाद बीजेपी ने न सिर्फ केंद्र में अपनी सरकार बनाई बल्कि नरेंद्र मोदी देश के आज प्रधानमन्त्री भी बने. लेकिन अब जब बिहार के विधानसभा चुनाव में नीतीश और लालू ने बीजेपी को रोकने के लिए पूरा दमखम लगा दिया है. तो ये बात काफी वास्तविक हो जाती है कि बिहार के मेहनती लोग इसबार कुछ नया ही रुझान देश के समक्ष पेश करेंगे. जिसके आगे हो सकता है सारे एग्जिट पोल धरे के धरे रह जाएँ.
अब बात आती है कि बिहार चुनाव ये दोनों बड़े गठ्बन्धन किस मुद्दे पर लड़ रहे हैं, ये बात काफी काबिले गौर है कि बिहार देश का अति पिछड़ा राज्यों में से एक है. और वास्तविकता में यहाँ ये देखकर हैरानी होती है कि जो बिहार के चुनाव नेताओं का भाषण सुनने को मिल रहा है. वह पूरी तरह तुच्छ राजनीति के तहत एक दुसरे के ऊपर व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप और जातिगत आंकड़ों को साधने तक सीमित हो गयी है. एक तरफ लालू-नितीश गरीबों के मसीहा बनना चाह रहे हैं. तो दूसरी तरफ बीजेपी हिंदुत्व के मुद्दे का सहारा लेकर विकास की गोली देने के जुगत में लगी हुई है. देश पिछले कुछ समय से अंतर्कलह और नयेपन में ढलने में लगा हुआ है. जिसकी वजह बहुत सारी विसंगतियाँ उभरकर सामने आ रही हैं. बिहार में वोट मांगने के इस तरीके को जायज अथवा नाजायज ठहराने के लिए एक बार फिर फैसला बिहार की जनता के हाथ में है. जो हर बार की तरह इसबार भी चौंकाने वाला आना चाहिए.



Monday, August 17, 2015

एक समय ऐसा लग रहा था कि गाल टेस्ट में भारत  सीधी  जीत दर्ज करेगा लेकिन खूबसूरत क्रिकेट ने अपनी अनिश्चितता दिखाई और पांसा पलटा श्रीलंका ने भारत को पटखनी दे दी। इस हार के बाद एक दौर शुरू होता है, नवनियुक्त कप्तान विराट को कोसने का तीन  पारियों की कप्तानी लाजवाब और बहुत अच्छी लेकिन आखिरी पारी में जब हेराथ की गेंदों ने हमारे बल्लेबाज़ों को परास्त कर दिया।  तब पूरा रुख बदल गया  पूर्व क्रिकेटरों का और   क्रिकेट के जानकारों का जिसकी कप्तानी पूर्व महान बल्लेबाज सुनील गावस्कर करते हैं. हमे सामने वाली टीम का कोई ख्याल ही नही है कि  ये टीम श्रीलंका है जो अपने चमत्कारिक खेल के लिए जानी जाती है।  पहली इनिंग उनकी खराब गयी थी और हमारी बनी हुई आखिरी इनिंग खराब गुजरी बाकी तो क्रिकेट है ही अनिश्चिताओं का खेल।  अब विराट नए हैं तो उनपर इतना दबाव देना ठीक नही आगे अभी हमे खेलना ही है न की वापस आना है।  रोहित और हरभजन को निशाना न बनाकर उन्हें अगले मैच भी मौका देना चाहिए।  मुझे  यकीन है ये लोग अच्छा करेंगे।  लेकिन  कल की खबर ने थोड़ा चौंकाया। रॉजर बिन्नी साहब ने अपने बच्चे का नाड़ा कसकर श्रीलंका भेजने का प्रोग्राम सेट कर दिया। हम लोग साफ़ सुथरा चयन चाहते हैं वो हैं उन्हें अपने लड़के की पड़ी है. विराट से मेरी यही गुजारिश है कि यही टीम मैदान में ले जाएँ जो हार का कारण बनता है वही जीत का बने। 

Thursday, March 5, 2015

बीच, बिकनी और बियर : होली के साल भर
गोवा­- अचानक एक ऐसे प्लान ने जन्म लिया था पिछले साल जो आज भी जीवन के सबसे यादगार पलों में पहले स्थान पर है. गोवा जाने का प्लान जो पूरी तरह से अपने आप में एक घटना की तरह था. न घर वालों को खबर न यार दोस्तों को २०१४ की होली यादगार होली बन गयी. गोवा एक ऐसी जगह जहाँ सिर्फ जिंदगियां मौज मस्ती करती ही मिलेंगी. एअरपोर्ट से बाहर निकलते ही कोई सपनों का शहर दिलों-दिमाग में आने वाला सजीव सामने खड़ा था. होटल बघा मरीना जो बघा बीच के पास एक फाइव स्टार होटल है जहाँ  पहुँचने में लगभग एक घंटे का समय लगा. लखनऊ वाया दिल्ली वाया बंगलौर फिर गोवा लगभग ४ घंटे का हवाई सफर लेकिन शरीर तो थकता ही है सफर चाहे जैसा भी क्यूँ न हो. हमने कमरे पर पहले आराम और कुछ खाने पीने को तरजीह दिया. बालकनी से स्विमिंग पूल में नहा रहे लोंग जिसमे विदेशी मूल के ज्यादा लोग दिख रहे थे. हमने भी नहाने का सोच रखा था पर पूल में नही अरब सागर में. हमारे होटल के से जो नज़ारे मिल रहे थे. उसमे थोड़ा बहुत बाज़ार भी दिख रहा था. लगभग दो घंटे बाद हम लोगों ने बघा बीच की तरफ रुक्सत किया बीच करीब में ही था और रास्ता मार्किट से होकर जाता है तो दुकानों की रौनके भी साफ़ नजर आती थी. ज्यादातर दुकाने कपड़ों की थी. सबसे ज्यादा बिकने वाला कपड़ा मेरे हिसाब से बिकनी था. बिकनी के खरीदार ज्यादा संख्या में विदेशी टूरिस्ट थे. बॉलीवुड में बिकनी के नाम पर फिल्मों के दर्शक बढ़ जाते हैं. लेकिन यहाँ तो बिकनी बेब्स की भरमार थी. उसके बाद बियर गोवा क्लबों का शहर है और बियर उसकी जान है . बिना बियर रंग में भंग के बराबर है. यहाँ आम भाषा अंग्रेजी है हिंदी हम आपस में ही बोल सकते हैं या हमे बहुत ही कम लोग हिंदी भाषी मिलेंगे. बियर लोग ऐसे पी रहे थे जैसे पानी वो चाहे सागर के पास चाहे रास्ता चलते हुए. हम यूपी वालों के लिए ये अलग दुनिया जो न तो किसी हद में है और न ही यहाँ कोई बवाल वाली बातें. लोग रोमांस में हैं या फिर आनंद में डूबे हैं. शहर की हर गली परफ्यूम से नहाई हुई लग रही थी. अदभुत खुशबू. बार तो हर नुक्कड़ पर मौजूद हैं बस डांसर को लुभाने के लिए एक लड़की और एक लड़के को लगा रखा गया था. लोग मस्ती में थे पूरा शहर मस्त मौला था किसी से किसी को कोई मतलब नही था. सबकी अपनी दुनिया थी. हम बीच पहुँच गये थे पहली बार मैं अपनी नंगी आँख से किसी सागर के उठती लहरों को देख रहा जो अनवरत बहाव को अपनी गोद में लिए हुए था. कुछ क्षणों के लिए मैं एक टक उन्ही लहरों को निहारता रहा. शानदार आसमान जो रुई के टुकड़ों जैसे बादल से अपनी सुन्दरता से सागर की लहरों को उर्जावान कर रहा था. सागर की लहरें हमारी तरफ बड़ रही थीं. उनके बहाव को देखकर ऐसा लग रहा था की जल्द ही ये हमे छू लेंगी. दिन ढलने को था हम सनसेट के नज़ारे को अपनी आँखों में समेट रहे थे. कुछ बार में लोग हुडदंग भी कर रहे हैं . धरती का ऐसा कोना जहाँ किसी की कोई दखलंदाजी है ही नही. अब बारी हमारी थी कि इस रंग में हम लोग भी रंग जाएँ. चश्मा, हाफ बरमूडा और कैप ये पहनावा आपको गोवा घुमने वाला दिखाता है. हमने ये सब पहन लिया और निकल पड़े गोवा के बीच और बार के शबाब का आनंद लेने. हम लोगों ने किराये पर स्कूटी ली जो टीवीएस कम्पनी की थी. हालाँकि यहाँ किराये पर एक से बढकर एक बेहतरीन बाइक्स उपलब्ध थीं. वैसे तो हमारे देश क्रिकेट के फैन लगभग हर घर में मिल जायेंगे. लेकिन गोवा में फुटबॉल का खुमार ज्यादा है. यहाँ पर आपको हर वो चीज़ मिल सकती है अगर आपके पास पैसा है तो . गोवा में कहावत है कि यहाँ बियर से सस्ती लड़कियां मिलती हैं. मैंने इस सच्चाई के बारे में जानने की कोशिश की. लोडो एक एस्कॉर्ट्स चलाता है जो एक बार के बाहर खड़ा हुआ है. ये बार बागा और calnugate के पास पड़ता है. मेरे पूछने पर उसने बताया की एक घंटे का २०० रूपये और १००० में रात भर. विदेशी  लड़की अगर राशियन है तो 2000 पर रात के लिए उपलब्ध थी. ये फैसिलिटी होटल के कमरे तक भी उपलब्ध थी. कुछ ब्यूटी पार्लर भी ऐसे धंधे में लगे हुए हैं. हमने एक थाई मसाज़ सेंटर जाकर वहां की सुविधा जानी तो इस सर्विस की बात को सबसे बाद में उन लोगों ने कबूला. वाकई अपने आप में हैरान कर देने वाली बात थी. वहां के एक लोकल निवासी अन्थोनी ने बताया ऐसे काम हर विदेशी नही करते हैं. इसमें वो लोग लिप्त हैं जो गरीब है मतलब गरीब विदेशी और उनके लिए ये कोई बड़ी बात नही है. अन्थोनी ने बताया ये लोग इसको एक प्रोफेशनल तरीके से अंजाम देते हैं. साथ ही साथ इसमें भारतीय मूल के लोग भी जुड़े हैं. गोवा का हर निवासी ये मानता है की लोग गोवा सिर्फ एन्जॉय करने आते हैं. जिसमे सेक्स भी एक मेनू है. बागा बीच से आगे बढ़ने पर हमे कई ऐसी बीच भी मिले जिनका नाम हमे याद नही है लेकिन वहां पैदल हमे पैदल ही जाना पड़ा था. जिसकी वजह से आज भी हमे याद आते हैं वो बीच. इनमे से एक बीच का नाम न्यूड बीच है जहाँ लोग नग्न अवस्था में सागर की उन्मादी लहरों में ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे. जिनमे जॉन एक किरदार था जो अपनी प्रेमिका के छोड़ देने से परेशान हैं. जॉन एक अमीर परिवार से हैं जो अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर से हैं. उन्हें उसके जाने का गम है. इसलिए वो अपना मन बहलाने भारत भ्रमण पर हैं. न्यूड बीच पर वो योग कर रहे जो वो 15 दिन तक करेंगे. जॉन की बातों मुझे प्रेम पर विचार करने पर मजबूर किया. फिर मैंने सागर से जानना चाहा क्यों लोगों का तेरी तरह विशाल नही होता. शायद सागर ने जवाब दिया की लोगों में मेरे जैसा बहाव नही होता.
अगले दिन हमने सागर की लहरों में बोट के सहारे सागर विहार किया. जो अपने आप में रोमांचक था. शनिवार शाम जो हर हफ्ते गोवा में धूम धडाका और पार्टी कल्चर अपने परवान पर होता है. पूरा शहर महक उठता है जगह जगह डीजे और सैम्पन उत्सव का माहौल.
यहीं जब हम बीच के किनारे होते हैं. यहीं सहसा जबान से निकल पड़ता है- बिकनी गर्ल्स ऑन दी बीच विथ बियर . समुन्द्र में रौशनी की अदभुत चमक जो इंद्रधनुष कभी कदार बारिश के बाद दिख जाता है गोवा में वो हर हफ्ते देख सकते हैं. (नोट: यादें हैं धुंधली भी पड़ सकती हैं.)

  

Friday, November 28, 2014


वक्त – बेवक्त – वक्त का तकाजा

पिछले कुछ दिनों से ज़िन्दगी की असलियत से रूबरू हो रहा हूँ. कैसे और क्यों इंसान वक्त के फेर में फंसकर निर्णय लेता है. वक्त और हालात ही इंसान को सही और गलत बनाता है. ये बात तब समझ में आती है, जब मारे थकान के लेडीज के कहने पर भी सामने वाला सहयात्री मेट्रो में सीट छोड़ने से मना कर देता है. अब देखने वाले युवक को अभद्र मानेंगे. लेकिन जब इंसान खुद भूखा होगा. तब वो दूसरे को कैसे खाने देगा. कहावत भी है भूखे भजन न होय गोपाला. जो बिलकुल सही है. इस दुनिया में 13.7 प्रतिशत लोग भूख के मारे मर जाते हैं. जो सभ्य मानवता के दम्भ को गहरी चोट देती है. दुनिया के कई ऐसे देश जहाँ लोग खाने के लिए एकदूसरे की जान भी लेने से गुरेज नही करते.  खैर हम अपनी बात बढ़ाने से पहले ऑस्ट्रलियाई ओपनर बैट्समैन फिलिप हुजेस को सर में बाउंसर गेंद लगने से हुई मौत पर उन्हें भावभीनी श्रदांजलि देते हैं. फिलिप अभी काफी युवा क्रिकेटर थे. तीन दिन बाद वो अपना जन्मदिन मनाने वाले थे. लेकिन काल को ये मंजूर नही था. लेकिन इस मौत के गैरइरादतन जिम्मेदार गेंदबाज अबोट का हाल उसी थके हारे युवक की तरह है जो सीट नही छोड़ रहा है. अबोट की इस मौत में कोई गलती नही है. लेकिन बाउंसर उन्ही के द्वारा फेंकी गयी थी. जो मौत का कारण बन गयी जबकि ये उन्होंने पहली बार नही फेंका होगा. लेकिन वक्त और हालात ने उन्हें खुद की नजरों में विलेन बना दिया. और अब आलम ये है की वो सदमे में हैं. क्रिकेट में एक बार वो पुराने जख्म हरे हो गये जब जब खेलते वक्त किसी खिलाडी की मौत हुई है. वहीं भारत में इस धार्मिक क्रिकेट को इन दिनों काफी शर्मशार होना पड़ रहा है. जो क्रिकेट के भक्तों को नागवार गुजर रहा है. लेकिन इन सबों के बीच एक बात साफ़ हुई है की आप बेईमानी करके हासिल तो कुछ भी कर सकते हैं. लेकिन उस चीज को बरकरार रखना ज्यादा भाग्य मांगती है. यहाँ फिर मेरे हिसाब से वक्त तकाजा ही जिम्मेदार है. श्रीनिवासन आज दुनिया के सबसे ताकतवर क्रिकेट संस्था के मुखिया हैं. लेकिन गंदे चोली ने दामन को थामे रखा है. इसके बाद बात मोदी की क्योंकि साल-साड़ी देने लेने वाले आपस में बात करना भी मुनासिब नही समझते सार्क बैठक में नजारा कुछ यूँ ही वक्त ने परोस दिया था. यहाँ नवाज की कोई गलती नही है क्यूंकि असल में वो तो सिर्फ अपने देश के नाम के प्रधानमन्त्री हैं. ये सबको पता है वहां की मिलिट्री अपने बंदूक के नोक पर नेताओं को नचाती है. हर जगह बोलने वाले मोदी को भी पाकिस्तान को भाषण सुनाने पर उन्हें न तो वहां का वोट मिलेगा न ही सपोर्ट. वैसे भी पाकिस्तान को सीधी बात समझ में भी तो नही आती है. उधर राहुल गाँधी इसलिए परेशां हैं क्यूंकि उनकी कोई सुनता नही है. अब सरकार भी नही है की कोई सरकारी बिल वो फाड़ कर फेंक दें. सब वक्त वक्त की बात है. 

Monday, October 13, 2014

एक तरफ पाकिस्तान की फायरिंग दूसरी तरफ ओमान का हुदहुद



हॉकी की हार से परेशां पाकिस्तान ने सीमा पर गोली पे गोली दे डाली. परेशानी ज्यादा बड़ती देख भारतीय फ़ौज ने जैसा की विदित है मुहंतोड़ जवाब दिया. पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ का इसमें कोई दोष नही क्यूंकि उनकी आजकल चल नही रही है. नवाज़ भी नही चाहते हैं हमारे मुल्क से उनके मुल्क का बैर हो. क्यूंकि उन्हें पता शेर एक कदम अगर पीछे गया तो वो और खतरनाक आक्रमण करेगा. भारत मंगल पर पहुँचने का जश्न मना रहा है. तो पाकिस्तान उस पड़ोसी की भूमिका में पूरी तरह से फिट बैठ रहा है जो न तो खेलता है और न ही खेलते हुए देख सकता है. हालाँकि वहां की आम अवाम ये विचार नही रखती है. क्यूंकि चाहे भारत हो या पाकिस्तान गरीब पहले पेट भरने की सोचता है. गौरतलब है कि आतंकियों ने भी इस गरीबी का फायदा उठाया है. जो वहां के नौजवानों को बरगलाने में कामयाब रहे हैं. एक खास मुलाक़ात में वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार हफीज चाचर ने पाकिस्तान की गरीबी को वहां के आतंकवादी कैम्पों के रौनक बढ़ाने वाला बताया था. उन्होंने ही पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त को लेकर एक बेहद दिलचस्प बात बताई थी की ये प्रान्त आजादी के वक्त पाकिस्तान का अंग नही था. जिसे बाद में पाकिस्तान ने जबरदस्ती संगीनों के साये में अपना प्रान्त बना लिया. बलोच वर्ग एक व्यापारी वर्ग माना जाता था. जैसे हमारे भारत में मारवाड़ी वर्ग. लेकिन आज की डेट में लगभग 2000 बलोच गायब हैं जिनका कोई अता पता नही है. ये वो बलोच हैं जो अलग बलूचिस्तान की मांग कर रहे थे. एक ज़माने में सबसे धनी वर्ग के ये लोग आज पाकिस्तान में सबसे गरीब हैं. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को जगमग करने में भारत अगर मदद न करे तो शायद ही वहां रात में उजाला हो. पोलियो उन्मूलन में पाकिस्तान की अपनी धार्मिक कट्टरत्ता जग जाहिर है. अमेरिका और दुनिया से आने वाला ऐड रोटी, कपड़ा और मकान से इतर भारत की शांति कैसे छीनी जाये उसमे खर्च हो जाता है. पाकिस्तान के बजट का 60 फीसदी सेना अपने विकास में लगाती है. हर बड़े सेना के अधिकारी अपना दूसरा घर गल्फ अथवा यूरोप देशों में रिटायरमेंट के बाद का जीवन जीने के लिए बनाये रखते हैं. रही बात भारत पर फायरिंग करने की तो ये मात्र उकसावा है. जैसे हमारे देश में बेनी वर्मा, दिग्य्विजय सिंह, ओवैसी, प्रवीण तोगड़िया और तमाम बड़ बोले नेता बेमतलब कुछ भी बोल देते हैं. जिसका वास्तविकता से कोई वास्ता नही होता है. बस इसे मीडिया अटेंशन कह सकते हैं. तो पाकिस्तान का मुख्य उद्देश्य है कश्मीर पर रार जिसकी वजह से वो पूरी दुनिया और मीडिया में अपनी पहचान बनाये रखे. अब देखा जाये तो सीजफायर का उल्लंघन करने का पाकिस्तान का इस समय एक कहावत को सच करता है. हमारे गाँव में लोग कहते हैं की सरतारी बनिया बाँट ही तौलता रहता है. उसके पास कोई काम ही नही है जिसमे वो व्यस्त हो सके. अपने घर में भी वो बम दागते रहते हैं. कभी कभी अमेरिकी ड्रोन से दो चार हो लेते हैं. यूएन में भी बे भाव वापस आ गये. कहीं न कहीं पाकिस्तान विश्व पटल पर अपनी गम्भीरता खो रहा है. वहीं भारत पीएम मोदी की अगुवाई में विकास प्रक्रिया में लगा हुआ है. अब पाकिस्तान का दिमाग शैतानी हो गया है. क्यूंकि वो पूरी तरह से खाली है. इधर मंगलयान भेज भारत दुनिया में अपनी उपस्थिति का कद और ऊँचा कर रहा है. असम और कश्मीर में आई बाढ़ से सफलता पूर्वक निपटने के बाद भारत का सामना भयंकर तूफ़ान हुदहुद से हो रहा जिसमे भी भारत ने डेढ़ लाख लोगों के विस्थापन को सहजता से अंजाम दिया. जो अपने आप में भारत की ताक़त अंदाजा लगाने को काफी है. पिछले साल फेलिन और केदारनाथ में भी भारत के जाबांजों ने अपना उत्कर्ष पेश किया था. ओमान से चले हुदहुद ने नुक्सान तो किया है पर शायद डेढ़ लाख लोगों की जान से ज्यादा नही.   

Saturday, October 4, 2014

मदिरा, सेक्स, चॉकलेट अथवा इन्टरनेट :इनमे सबसे ज्यादा क्या चाहते भारतीय  
कितना लगाव है भारतीयों को इन्टरनेट से? जवाब मिलता है बहुत ज्यादा 
एक अंतर्राष्ट्रीय सर्वे से पता चलता है कि दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारतीय लोग इन्टरनेट का उपयोग ज्यादा करते हैं. ये सर्वे भारत की ही संचार प्रदाता कंपनी टाटा कम्युनिकेशन ने किया है. सर्वे में 6 देशों से 9,417 लोग शामिल हुए. इसमें भारत, यूएस, यूके, सिंगापूर, जर्मनी और फ्रांस के लोगों ने भाग लिया.
32.5% भारतीय ६ से १२ घंटे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं. जबकि 14% भारतीय 12 घंटे या उससे अधिक देर इंटरनेट का उपयोग करते हैं, जो अन्य सभी देशों का दोगुना है. सिर्फ 44 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि वो १२ घंटे बिना इन्टरनेट चलाये रह सकते हैं- जो सर्वे में शामिल अन्य देशों के मुकाबले सबसे कम है. 53 फीसदी भारतीय इन्टरनेट न होने पर उसकी कमी महसूस करते हैं. तो वहीं 18 फीसदी काफी बेचैन हो जाते हैं. इन्टरनेट की ऐसी निर्भरता अन्य देशों के लोग नही महसूस करते हैं.
इन्टरनेट के बदले सेक्स जैसी राय भारतीयों कम ही रखते हैं. वे बिना पलक झपकाए टेलीविजन देख सकते हैं. सर्वे के मुताबिक 43 फीसदी भारतीय टेलीवजन के बदले इन्टरनेट का उपयोग करना पसंद करते हैं. लेकिन 19 फीसदी शराब के बदले इन्टरनेट और 4 फीसदी अपने कुंवारेपन के बदले इन्टरनेट का उपयोग करना पसंद करेंगे. जोकि अन्य देशों की तुलना में बेहद कम है.
इन्टरनेट के प्रति ऐसा रवैया गूगल और फेसबुक जैसी कम्पनियों के लिए बहुत ही अच्छी खबर है, जो भारत में बड़ते इंटरनेट उपभोक्ताओं को आधार बनाकर अपना विस्तार कर सकती हैं. गूगल के मैनेजिंग डायरेक्टर राजन आनंदन मानते हैं और कहते हैं २०१४ के आखिर तक भारत में इन्टरनेट उपभोक्ताओं की संख्या यूएस से भी ज्यादा हो जाएगी.
अभी जल्द ही गूगल ने एंड्राइड वन लांच किया है- ये फ़ोन गूगल के नेक्सस की तरह ही है लेकिन ये काफी सस्ता है- आशा है इस सस्ते स्मार्टफ़ोन के आने से लगभग 1 करोड़ भारतीय जो पहली बार इन्टरनेट का उपयोग करेंगे. गूगल एंड्राइड, क्रोम और गूगल अप्प्स के वाईस प्रेसिडेंट सुंदर पिचाय कहते हैं अभी भारत में लगभग एक अरब लोग इन्टरनेट का उपयोग करने से वंचित हैं.
लेकिन इन्टरनेट का ऐसा जूनून लोगों अपने आपे से बाहर भी कर सकता है. मतलब इन्टरनेट के साइड इफ़ेक्ट भी हैं. राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तांत्रिक विज्ञान के एक शोध से पता चला है की बंगलोर में 73 फीसदी अल्पयुवा मनोवृति तनाव से ग्रसित हैं और इसके पीछे जो कारन पाया गया है वो इन्टरनेट की लत है.

भारत में इसके चलते कई जगह इन्टरनेट की लत से छुटकारा पाने के लिए केंद्र भी खुल गये हैं. ऐसे केंद्र यूएस में काफी मशहूर है, लेकिन धीरे-धीरे ये कांसेप्ट भारत में भी गति पकड रहा है. ऐसे युवा जो इस लत से ग्रसित हैं वो इंटरनेट का खूब इस्तेमाल करते है, बहुतों को जब इन्टरनेट नही मिलता है तो वो पैसा चुराकर साइबर कैफ़े भी जाने में नही झिझकते हैं. भारत में इस तरह का केंद्र सबसे पहले बैंगलोर में उसके बाद दिल्ली में और अभी जल्द ही पंजाब में खोला गया है.