मैं किसान का बेटा हूँ
.......
गेहूं की फसल अपने चरम है,
पूरी धरती सोना हो गयी है, बालियाँ की खनक ऐसी है मानो कोई कमसिन सुंदर लड़की की
खनकती हंसी हो.... पूरे गावं में ख़ुशी सा माहौल है पंशुओं में भी लहर दौड़ पड़ी है
क्यूंकि अभी तक वो किसी एक जगह बंधे रहते थे लेकी अब उन्हें खली खेतों में चरने का
मौका मिलेगा साथ ही उनका प्रिय आहार भूसा भी मिलना शुरू हो जायेगा .... ये वही
मौसम है जब किसान मस्त होकर अपने काम में लग जाता है ... उसे बहुत सारा काम करना
होता है, लेकिन चैत की सुबह और शाम में हवा के मध्धम झोके में आल्हा गेट हुए वो
अपने सरे काम निपटाताजाता है ... दूर खेतों से जब वो अपने सर पर गेहूं का बोझ लाकर
रखता है और लुगाई उसे निहारते हुए एक हाथ में गुढ़ और एक हाथ में लोटे में नल से
निकाला गया ठंडा पानी लिए खड़ी होती है ....जिसे पीकर किसान अपने काम में फिर पूरे
मन से लग जाता है ... पढने वाले बच्चे भी गर्मी की छुट्टी के मौके में अपने पिता के कामो में हाथ बंटाते हैं ...कहते
हैं इस मौसम दुधारू पशुओं का दूध बढ़ा ही स्वादिष्ट होता है ... आम आदमी को एक
मात्र खाने को मिलने वाला फल आम भी इसी मौसम में तैयार हो रहा होता है .. बागों
में चहल पहल बढ़ जाती है .. कोई पेड़ पर चढ़ कर , तो कोई लग्गियों और लबेदों से आम का
शिकार करता है .. आम आम पर वार करता है ... ये कहानी हर साल चैत में घटित होती है
, पर इसबार इसमें मसाला लगा है वो भी काफी गर्म और चोख ... चुनाव २०१४ की सरगर्मी
चारो तरफ राजनीतिक चर्चाएँ तेज हो चली खेतों में ही फैसले हो रहे हैं किसे वोट
देना है .. महंगाई , गरीबी , बेरोजगारी और बढ़ते
डीजल के मूल्य मुख्य मुद्दे हैं ... जो पार्टी इन मुद्दों को ध्यान में रखे
हुए है या इन्हें कम करने की बात कर रही है.. वो उसी को वोट देने की बात करते हुए
अगला बोझा उठा लेते हैं और गाते हुए खलिहान की तरफ कदम बड़ा देते हैं ....
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