चालीस लोग और चालीस सपने....
मास कम्युनिकेशन में एडमिशन
लेने से पहले मैंने mba करने का सोचा था लगभग सबकुछ फाइनल हो चुका था . bba के बाद
mba ही सही होता है ऐसा लोगों ने मुझे बताया भी था . लेकिन बचपन का शौक और कुछ
समकक्ष साथियों ने मीडिया में भी अच्छे करियर का सुझाव दिया . जो हमे mba से दूर
लेकर एक ऐसी क्रिएटिव संसार में ले आया जहाँ मैखुद को ज्यादा विश्वसनीय प् रहा था
.. ये वो दुनिया है जहाँ आप किसी की आवाज को दुनिया के सामने लाते हैं .. तस्वीर
का दोनों पहलू आपको दिखाना होता है .. लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ की बहुत सारी जिम्मेवारियां
तो होती ही हैं साथ ही साथ देश की अदालत की गरिमा को ध्यान में रखते हुए हम यहाँ
कोई निर्णय नही सुना सकते हैं ..इस कोर्स में एडमिशन लेते वक्त दिमाग में जो बात
गूँज रही थी वो थी ग्लैमर जो लगभग हर छात्र को अपनी तरफ आकर्षित करने में सक्षम थी
. लेकिन पहली क्लास करने के बाद ये धारणा टूट गयी हालाँकि ग्लेमर जो दिखता है उसके
पीछे बहुत ही होम वर्क होता है ..जमीनी हकीक़त और चकाचौंध में काफी अंतर है .. हर
कार्यक्रम और शो के पीछे बहुत ही काम हुआ होता है .. पत्रकारिता और जनसंचार विभाग
,लखनऊ यूनिवर्सिटी में कदम रखते ही ग्लैमर और हकीक़त का फ़र्क समझ में आ गया और दूध
का दूध और पानी का पानी हो गया . 40 की संख्या का बैच और उनके चालीस तरह के सपने
कोई एंकर , कोई न्यूज़ रीडर कोई मॉडल कोई एक्टर कोई रेडियो जॉकी और बाक़ी ४ ५ लोग
हमारी तरह पत्रकार बनना चाहते हैं .. हैरत की बात ये भी है की कुछ लोग टाइम पास
करने भी आये हैं ... क्यूंकि कुछ नही मिला मास कम्युनिकेशन में एडमिशन ले लिया ..
मजेदार बात ये भी है की कुछ शादी की cv को मजबूती देने के लिए भी दाखिला ले लिए
हैं ...खैर ये तो रही पर्सनल राइ लोगो को खुद को लेकर जो बहुत ही मायने रखती है ये
से शुरुआत होती बनने और बिगड़ने की .. जिसका गोल क्लियर है वो उसी तरह अपनी तैयारी
क्र रहा था .. मैं रेडियो का शौक़ीन था तो रेडियो में जाने की सोच रहा था .. पर २
से ४ क्लास करने के बाद लगा की पहले प्रिंट बाद में इलेक्ट्रॉनिक देख लिया जायेगा.. अच्छा मेरी प्रायोरिटी बदलने का
कारन काफी हद तक परम आदरनीये डॉ मुकुल श्रीवास्तव सर का रहा .. क्यूंकि जब सच्चाई
और जमीनी हकीक़त पता चला तो पहली बात ये थी की अगर आपको लिखना आता है तो आप कुछ भी कर
सकते हैं .. अभी तक हम सब बहुत ही बायस्ड
थे जो शायद चीजों को हमारे लिए पेचीदा बना रहा था .. दिमाग में कचरा भरा था जिसकी
वजह से हम न तो नया सोच पते थे न ही नया एक्सेप्ट कर प् रहे थे जो काफी टकराहट का
कारन बन रहा था .. क्यूंकि अबतक हम तस्वीर का दोनों पक्ष नही देखते थे .. पर मुकुल
सर की मदद से नाली को चोक सही हो रहा था और कचरा निकलना शुरू हो गया था .. हालाँकि
हर कोई इस काम में सफल नही हो प् रहा था .. पर सफाई करने में सब लगे हुए थे ....
(मास कम्युनिकेशन शरुआती
दिनों की याद में ...............जुलाई २०१२)
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