Wednesday, July 30, 2014

क्या है ई-शासन.....
भारत गाँवो का देश है, देश की ७२ फीसदी आबादी आज भी गांवों में निवास करती है. वर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार देश में 638,387 गांव हैं. ये आबादी ही भारत के भविष्य को तय करती है, अत: सरकारों को अपनी नीतियों के निर्धारण में ग्रामीण विकास को सबसे ऊपर रखना होता है. ग्रामीण विकास में सामाजिक न्याय,आर्थिक विकास और न्यूनतम बुनियादी जरूरतों को पूरा करना ही किसी भी सरकार का कर्तव्य होता है. विविधता से भरे इस देश को आपस जोड़ने के लिए तकनीकी विकास बहुत जरूरी है, जिससे सरकारों को अपने नागरिकों से जुड़ने में आसानी होती है. ग्रामीण विकास की इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती है शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के अवसर, आजीविका के संसाधन, गरीबी उन्मूलन से जुड़े कार्यक्रम और बुनियादी ढांचे में सुधार की. सरकार का मुख्य उद्धेश्य ग्रामीणों के जीवन स्तर को ऊपर उठाना है. इ-गवर्नेंस यानी इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेंस जो सरकार की योजनाओं और कामकाज को ग्रामीणों तक सीधे पहुँचाने में एक कड़ी का काम कर रही है. इसमें देश में चल रही सभी योजनाओं को लोगों तक आसानी से पहुँचाने का लक्ष्य है. इस योजना का नाम राष्ट्रीय ई-शासन योजना रखा गया है. जिसमे सरकार की कोशिश ज्यादा से ज्यादा ग्रामीणों को सरकार की नीतियों और योजनाओं से जोड़ने का है. योजना का मुख्य उद्धेश्य है सरकारी योजनाओं का गाँव के लोगों तक आसानी से पहुंचाना. सुचना और तकनीकी का बेहतर इस्तेमाल करते हुए विकास के पथ पर चलने में इस योजना का महत्व और बड़ जाता है. इस योजना के अंतर्गत ऑनलाइन सेवायें –
1.आयकर
2.पासपोर्ट/वीजा
3.कंपनी मामले
4.केन्द्रीय उत्पाद शुल्क
5.पेंशन
6.भू-अभिलेख
7. सड़क परिवहन
8. सम्पति पंजीकरण
9. कृषि
10. नगर पालिकाएं
11. ग्राम पंचायतें
12.पुलिस
13.रोजगार कार्यालय
14.ई-न्यायालय

देश के भिभिन्न प्रदेशों में इस योजना को अलग- अलग नामों से जाना जाता है. उत्तर प्रदेश में इस योजना का नाम  लोकवाणी है इसी के माध्यम से प्रदेश के कई महत्वपूर्ण कामों को किया जा रहा है जिसके अंतर्गत आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण, निवास प्रमाण पत्र, बैंक का खाता खुलवाना, वोटर कार्ड, राशन कार्ड और किसानो को घर बैठे मंडी के भाव और उन्नत बीजों की जानकारी बेहद आसानी से प्राप्त हो जाती है. पहले जहाँ इन्ही सारी  चीजों को बनवाने में बहुत सारा भागदौड़ और पैसा लग जाता था वहीं अब ये सारे काम एक ही छत के नीचे एक ही वक्त में आसानी से हो जाती हैं. ग्रामीण सोने लाल से बात करने पर ये पता चलता है की लोकवाणी उनके लिए समय बचाने और उपयुक्त सूचनाएं उपलब्ध करवाने में काफी मददगार है. सत्यप्रकाश सिंह ग्राम प्रधान सौरुपुर श्रावस्ती से बात करने पर ये पता चलता है की ई-शासन से बहुत से कामों को करने में आसानी हुई है, अब हमारे पास ग्रामीण दौड़ा हुआ नही आता है. अब लोकवाणी के माध्यम से हमे लोगों के दस्तावेज मिलते हैं और हम उन्हें सत्यापित करके लोकवाणी केंद्र को ही वापस कर देते हैं. जिससे चीजें साफ़ सुथरी और न्याय संगत बनी रहती हैं. ई – शासन के माध्यम से अब खसरा, खेतौनी, थाने में रिपोर्ट लिखवाना, न्यायालय में अर्जी देना और ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना भी बेहद आसान हो चला है. इस योजना से सरकार को भी बहुत सारी चींजों में आसानी हुई है जैसे लोगों का रिकॉर्ड बनाने में, लोगों के अधिकार और हक सही लोगों के हाथो तक पहुँचाने में और तमाम जानकारी जन जन तक पहुँचाने में भी ये योजना सरकार की मदद करती है.

Friday, July 18, 2014

हमारा पहला टकराव तंत्र से भाग -2


दिन भर इन्तजार करते हुए लगातार दिमाग एक बात सोचता रहता था कि इस देश का कानून वास्तव में अँधा है. पॉवर और सोर्स बाज़ी इसके दो नमूने हैं, जो इसे मजाक और काफी जटिल बनाते हैं. भारतीय पुलिस दुनिया के सबसे भ्रष्ट तंत्र में आती है इसका नमूना पुलिस ने इस मामले में भी पेश किया. जैसे ही थाना परिसर में मैं पहुंचा एक तीन तारे वाले ने मुझे धमकी देते हुए वहां से जाने को कहा, मेरे बाकी दोस्त रस्ते में थे जो पहुँच रहे थे. मेरे मिलने के निवेदन को भी उस दरोगा न ठुकरा दिया. धीरे धीरे हमारे दोस्तों की संख्या बढ़ रही थी. मामला उतना बाधा नही था जितना पुलिस वाले बोल रहे थे. मुझे गुस्सा इस बात की लग रही थी जो पुलिस ने बिना दुसरे पक्ष की बात सुने उन्हें मुलजिम बना कर ले आई थी. शाम ढल रही थी, एक दोस्त की मां भी वहीं आ गयी थी जो काफी परेशां थी. एकलौता बेटा जिससे सारी उम्मीदें ऊपर से लड़का पुलिस कस्टडी में इससे बुरा एक मां के लिए और क्या हो सकता है. एस ओ के आने इन्तजार हो रहा था जो कहीं बाहर निकले हुए थे. कुछ सिपहियों की काना फूसी से पता चला की उनके आते ही हो सकता है इन लोगों को छोड़ दिया जाये. एस ओ लगभग 8 बजे आये और उन्होंने ऊपरी दबाव का हवाला देते हुए अपनी बात रखी की रेखा जी मान नही रही हैं. लेकिन कुछ देर बाद एस ओ के जाते ही हमारे दोस्तों को छोड़ दिया गया. हम लोग काफी खुश थे और वहां से निकल पड़े. ये वक्त था जो काफी शुकून दे रहा था हम लोग खाना खाने निकले. खाना आर्डर करते ही विशाल का फ़ोन आया जो उठाने पर पता चला की थाने से फ़ोन आया है की सब लोग वापस आ जाओ. हम सब चकित थे फिर विशाल को मना करते हुए खाने पर जुट गये दिन भर की भूंख को शांत करने में. लेकिन जब नीतीश और नीरज लगातार फ़ोन करने लगे तो लगा शायद सच में बुलाया जा रहा है. खाना खा कर हम लोग महानगर थाने में पहुंचे जहाँ से एस. ओ. उन लोगों को रात भर गाजीपुर थाने में रुकने को बोल रहा था. पुलिस का कहना था वो सुबह 4 बजे उन्हें यहाँ से छोड़ देंगे. अब बचे हम तो हमने दरोगा से पूछा की हम भी यहाँ रुक सकते की नही तो वो बोले जैसी तुम्हारी इच्छा तो हम भी रुक गये. थाने में पहली बार वो भी बिना किसी जुर्म के एक खास पल को जीने की बेताबी मेरे दिल जरा सा भी खौफ नही चेहरे पर लगातार हंसी जो मेरे दोस्तों के भारी मन को हल्का कर रही थी. १२ बाई 4 के कमरे में हमे रात गुजारनी थी. कमरे में 3 से 4 कंप्यूटर थे, जो सब ऑन थे. एक कूलर और 3 कुर्सियां साथ में एक दरी जिसपर सोने की इजाज़त थी. संघर्ष और नाराजगी के इस लम्हे में भी मुझे मजा आ रहा था क्यूंकि मैं पाक साफ़ था फिर भी उन लोगों के साथ मैं था उनलोगों को भी मौज आ रही थी. पता नही क्यूँ आज क्रांति कारी होने का एहसास हो रहा था. भगत सिंह और चंद्रशेखर की याद रही थी. धीरज पाल को आज अरविन्द केजरीवाल की याद आ रही थी आज उन्हें पता चल रहा था की सिस्टम से लड़ना इतना आसान काम नही है. अचानक एक महिला पुलिस पर नजर पड़ी जो ड्यूटी पर थी. बमुश्किल एक थाने में 4 से ५ ही महिला पुलिस होती बाकी पुरुषों का ही बोलबाला होता है. उनका इन पुरुष साथियों के साथ काम करना काफी मुश्किल होता है ये उनके चेहरे को देखकर मुझे साफ़ पता चला रहा था. उन्हें कुर्शी पर ही सोना होता है और साथ ही साथ उन्हें अपने पुरुष सहकर्मी के मजाक भरी बातों को अवॉयड करना होता है. पुरुष पुलिस आपस में गाली गलौच और घटिया मजाक करते रहते हैं जो उन महिलाओं को मजबूरी में सुनना पड़ता है. ये काफी जटिल होता है जब आप किसी चीज को पसंद नही करते हैं और वही आपके सामने या साथ में घटित हो रहा हो. वैसे दुनिया के सबसे भ्रष्ट तंत्र से आपको अच्छे मजाक की उम्मीद भी नही होनी चाहिए. आज हम पांच लोग एक अलग ही कश्म्कस से गुजर रहे थे और पैसा और पॉवर की ताकत से रूबरू हो रहे थे. कोई जुर्म नही फिर भी फंस जाना युवाओं को उकसाता है. वो युवा चाहे कश्मीर के हों या फिर लखनऊ के हों. आज ये बात भी महसूस हो रही थी की बुरे वक्त कि चोट हमे बुरे कर्म की तरफ धकेलने के लिए जिम्मेदार भी हो सकती है. कश्मीर घटी के युवा क्यूँ बात को हल नही मानते हैं और बन्दूक से अपनी बात मनवाना चाहते हैं क्यूंकि उनकी आवाज को सुनने की जगह दबाने की कोशिश की गयी जो सरासर गलत है. अपने अधिकार की खातिर लड़ना बेमानी नही है. न जाने क्यूँ आज हम खुद को आतंकवादियों के करीब पा रहे थे. धीरे धीरे रात कट रही थी और हमारी सोच फैलती जा रही थी कभी हम महिला कर्मी की मजबूरी तो कभी उस धोखेबाज महिला कर्मी की कारगुजारी को कोस रहे थे. कुछ ख़ास लोगों को मौके पर खामोश रहना भी आज टीस रहा था मनमोहन सिंह की याद आ रही थी. फिर उस दिन का चक्र हमे समय की औकात का अंदाजा लगवा रहा था. माना हम तो पढ़े लिखे लोग हैं तो पुलिस हमे हल्के में नही ले रही थी लेकिन उन गरीबों के ये पुलिस क्या करती होगी इसका अंदाजा आज हम बखूबी समझ रहे थे. आखिर कार सुबह पिकनिक जैसा माहौल था जो किसी भी मामले को दरकिनार कर रहा था. बस बात वहां से निकलने की बची थी जो जल्द ही पूरी होने की उम्मीद थी. जैसे जैसे सूर्य अपनी रौशनी बड़ा रहा था वक्त आज़ाद होने का निकट आ रहा था क्यूंकि नियम भी 24 घंटे से ज्यादा रोकने के खिलाफ था. तो लगभग २:30 बजे एस. ओ. ने हमे वहां से जाने का आदेश दिया. हम सब में मनो ख़ुशी की लहर जैसे दौड़ पड़ी और भूख मानो अपने चरम पर आ गयी हम सब वहां से निकलते हैं. तो ये रही थाने में बिताया गया अपने आप में एक अनोखा पल जो तह ज़िन्दगी ज़हन में बना रहेगा. यादगार रात और यादगार पल जीवन को रोचक बनाते हैं और बार बार नही आते हैं.

Wednesday, July 9, 2014

हमारा पहला टकराव तंत्र से ..... भाग -1 


कहते हैं ज़िन्दगी में  समय के  गर्भ का कोई अल्ट्रासाउंड नही होता है. वक्त कब कौन सा करवट ले ले इसका हम अंदाजा तक नही लगा सकते हैं. हम कभी कभी कर कुछ और रहे होते हैं और घट कुछ और जाता है, साथ ही साथ छप कुछ और जाता है. हमारा प्लान कुछ और होता है और हमको करना कुछ और ही पड़ जाता है. लगभग 15 दिन की छुट्टी बिताकर गाँव से लखनऊ की कूच सुबह 8 बजे करते वक्त अपने दोस्तों को 11बजे तक मिलने का वादा करते हुए अपनी 160 किलोमीटर की मैराथन यात्रा शुरू कर देता हूँ. रास्ता बादलों और मामा के गुस्से की गरज में कट रही थी. मामला वाटर कूलर महंगा लगवा लेने का था साथ उनसे बिना पूछे हुए पैसे का पेमेंट भी कर दिया गया था जो लगभग 76000 था. जो मेरे हिसाब से भी महंगा था और उनका गुस्सा होना लाजिमी था. लेकिन मैं कुछ बोल नही सकता था क्यूंकि भाई को सिर्फ मामा ही डांट सकते थे और मेरे हिसाब से सही ही था. जैसे जैसे हम रामनगर से आगे निकले उनको गुस्सा घाघरा के बहाव में बह चुका था. लगभग 11:30 बजे हम लखनऊ पहुँच गये जहाँ दफ्तरों का निपटाते निपटाते 3 बज गये. खाना आर्डर करने से पहले २:38 पर उन लोगों की आखिरी कॉल आई थी और वो लोग मुझे कैमरे के साथ आने को बोल रहे थे. मैंने उनसे 30 मिनट का वक्त माँगा था. कहना खाने के बाद जब हम मामा से विदा लेकर रूम की तरफ बड़े और उनलोगों को कॉल करना शुरू किया तो उनके नंबर स्विच ऑफ बताने लगे थे. फिर मैंने उन चारो के नंबर पर कॉल किया लेकिन वो सब स्विच ऑफ की मुद्रा में थे. मैं कमरे की तरफ बढता जा रहा था और दिमाग में चीजों का मतलब निकाल रहा था की नंबर स्विच ऑफ क्यूँ जा रहा है. एकबारगी मुझे लगा की वो सब गिरफ्तार तो नही कर लिए गये. क्यूंकि वो लेडीज बाबू और उसके दो सहायक पिछली बार जब हम भी थे साथ में तो उनका टोन थोड़ा हाई था. जो बवाल करवा सकता था. मैं रूम के अन्दर गुसा तो लगा की मैं बहुत तन्हा हूँ यहाँ तो बहुत अकेला हूँ. बैग रखते हुए दिमाग को स्थिर करने की कोशिश कर रहा था जो हो नही रहा था. मैंने बिना कपड़े बदले विकास भवन का ऑटो पकड़ कर वहां पहुंचा वक्त था 4 बजे का बहुत कम लोग बचे थे जो अपनी दिन भर की बातों में मशगूल थे, लेकिन उनके दिमाग पर कोई थकावट नही थी क्यूंकि वो काम ही नही करते हैं. वहीं मिले सीडीओ के चपरासी ने बताया उन चार लड़कों को पुलिस गाजीपुर थाने में ले गयी है. मुझे जो अंदेशा था वही सन्देशा मिला. एक दोस्त जो काफी मददगार रहा और मेरे एक काल पर वो खुद और अपनी बाइक लेकर आ गया और हम थाना गाजीपुर के लिए निकल पड़े. वैसे अपने कसबे के थाने में हम स्चूली दिनों में घूम चुके हैं थाना देखने गये थे एक दोस्त के साथ कि कैसा होता है. आज दरोगा से बात करनी थी मन में हडबडाहट थी की क्या बोले. वहां पहुँचने पर एक सिपाही ने पुछा क्या काम है, तो हमने पूछ लिया दरोगा कौन है यहाँ का मुझे कुछ बात करनी है यहाँ के दरोगा से. दरोगा बोला हाँ बताओ क्या बात करनी है मैं हूँ यहाँ का दरोगा. विकास भवन से आप मेरे चार दोस्तों को पकड़ कर यहाँ लाये हैं. उसने बोला हाँ तुम कौन मैंने जवाब दिया और बोल दिया मैं मनोज तिवारी इन सबका दोस्त. मैंने पुछा क्या किया था जो आप इन्हें यहाँ ले आये. उसने कहा नेता बन रहे हैं और अब जेल जायेंगे. हमने कहा मिल सकते हैं, उसने कहा तुम जाओ नही तुम्हे भी बैठा देंगे, हमे क्यों? तुम्हे इतनी फिक्र जो है उनकी, हमने कहा अच्छा. दो दोस्तों को इन्फॉर्म करते हुए मैं बाहर आया और पैरवी की शुरुआत की. थाने का पहला मामला था मेरा जिसमें मुझे लीड भी करना था. घरवालों से मदद नही ले सकता था अपने दोस्तों से ही उम्मीद थी. हालाँकि मुझे ये पता था और मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूँ की उन्हें फंसाया जा रहा था. 

Monday, June 9, 2014

बदलता वक्त
वक्त किसी के लिए न तो रुकता है न ही किसी का इन्तजार करता है. ये सिर्फ वक्त वालों के साथ रहता है. आप चाहे लाख कोशिश करलें इसे आप बदल नही सकते हैं. जो वक्त के साथ कदम ताल नही मिला पाया है उसका वक्त जाना पक्का है. चाहे आप राजनीती में अडवाणी को लें या मोदी को कोई दोनों वक्त की परिभाषा को सार्थक करते हैं. एक समय था जब अडवाणी के प्रशंसक उन्हें अपने खून का तिलक लगा देते थे. लेकिन जब समय बदला तो आज उनसे जूनियर मोदी उनके सामने प्रधानमंत्री का शपथ ले रहे थे. कहने का मतलब वक्त ने अडवाणी को ख़ारिज कर दिया और मोदी के साथ हो चला. यही हाल फ़िल्मी दुनिया का भी अमिताभ बच्चन आज भी उतने ही पॉपुलर हैं जितना की वो सन 80 में हुआ करते थे. उनके साथ का कोई भी अभिनेता आज इस मुकाम पर नही है. ऐसे ही अक्षय कुमार और सुनील शेट्टी के साथ हुआ है. आज जहाँ सुनील शेट्टी को काम के लाले पड़े हैं वहीं अक्षय कुमार साल भर में मिलाकर 3 से 4 फिल्में देते रहते हैं. इन दोनों में बस इतना फ़र्क है की अक्षय कुमार ने खुद को वक्त के साथ बदल लिया और वही काम सुनील शेट्टी नही कर पाए. खेलों में भी ये बात लागू होती है एक जमाना था जब टीम इंडिया में सौरव गांगुली की टूटी बजती थी. दादा के नाम से मशहूर इस क्रिकेटर ने सही वक्त पर सन्यास न लेकर अपने क्रिकेट जीवन के आखिरी पलों को कड़वा कर दिया. यही हाल द्रविड़, लक्ष्मण और पोंटिंग का भी हुआ. ये रहे कुछ बढे उदाहरण जो काफी हद तक खरा उतरते हैं. लहर और वक्त के साथ चलना ज्यादा आसान रहा है वनस्पति के इसके विपरीत. वैसे परिवर्तन संसार का नियम है जो होता रहता है और हमे हमेशा नई चीजों को समझते हुए अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए. आजकल एक सबसे बढ़िया उदहारण है. वो है मोबाइल फ़ोन जो आज के वक्त में रोजाना अपडेट होती रहती है. कहाँ वो अन्टीना वाला फ़ोन आज कंप्यूटर से भी तेज और  ज्यादा काम कर रहा है. और तो और अब तो ये स्मार्ट भी हो चला है. सूचना क्षेत्र में तो क्रांति लेकर आया है ये फ़ोन फेसबुक , ट्विटर और व्हाट्सएप्प जैसे सोशल मीडिया टूल ने तो अभिवक्ति को ऐसा प्लेटफार्म दे रहे हैं जिनसे देश की राजनीति तक प्रभावित हुई है. कालिंग और मेसेजिंग को भी नये आयाम मिले हैं. लोगों ने खुद अपनी बात दुनिया के सामने रखना शुरू किया है जो दुनिया में एक नई शुरुआत है. वो चाहे मिस्र की क्रांति हो या अन्ना का मोमेंट या चाहे  दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल का प्रचार प्रसार या फिर देश का सबसे बड़ा चुनाव और मोदी की जीत में भी सोशल मीडिया का प्रभाव रहा है. लेकिन ऐसा नही है हर कोई सोशल मीडिया पर खुद को सहज नही महसूस कर  पा रहा ये भी एक विशेषता है जो वक्त के साथ नही चल पाया या फिर वो बदलाव के मुताबिक खुद को तैयार नही कर पाया है.

कहने का सीधा मतलब है वक्त के साथ चलने में ही भलाई है. जो आज हमारी ज़िन्दगी में नई चीजें शामिल हुई हैं उनसे हमारा काम और जीवन आसान ही हुआ है. बस हमे चीजों से ताल्माले बनाकर चलना सीखना होगा.

Wednesday, June 4, 2014

बाल श्रम और कानून
होमर फलेक्स के अनुसार, बालकों द्वारा किया जाने वाला कोई भी कार्य जो उनके पूर्ण शारीरिक विकास, न्यूनतम शिक्षा तथा आवश्यक मनोरंजन में बाधक हो, वो बालश्रम कहलाता है। बाल श्रम का अर्थ बच्चों को उत्पादन से संबंधित ऐसे लाभकारी व्यवसाय में लगाना है जिससे उनके स्वास्थ्य को खतरा हो तथा उनके विकास में बाधक हो। ये सिर्फ उद्योगों  में लगे हुए बच्चों पर ही लागू नहीं होता है। ये उन तमाम छोटे-मोटे व्यवसायिक काम जो 18 वर्ष की कम आयु वाले बच्चों के मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और नैतिक विकास में रूकावट डाले वो सब भी बालश्रम कानून के तहत आता है।
बाल श्रम अपने आप में एक सामाजिक कलंक है। ये समस्या सबसे पहले अन्र्तराष्टï्रीय स्तर पर 1924 मेें जेनेवा में उठायी गयी। इसी घोषणा पत्र में बच्चों के अधिकार को मान्यता देते हुए पांच सूत्री कार्यक्रम की घोषणा कर दी गई। साथ ही साथ बालश्रम को प्रतिबंधित भी कर दिया गया। 1989 में  संयुक्त राष्टï्र के सदस्यों द्वारा बालश्रम को रोकने के लिए और दण्ड के प्रावधान को लेकर हस्ताक्षर किये गये।
भारत में बाल अधिकार
बाल अधिकार अधिनियम 1933, बाल रोजगार अधिनियम 1938, भारतीय कारखाना अधिनियम 1940 ऐसे कुछ प्रावधान बालश्रम को रोकने के लिये थे। जो स्वतंत्रता पूर्व बनाये गये थे और आज भी लागू हैं। स्वतंत्रता के बाद 1952 में पारित औद्योगिक विवाद अधिनियम में भी बाल श्रम निषेध कर दिया गया। संविधान के तहत ये सुनिश्चित किया गया कि 6 से 14 वर्ष तक की आयु वालेे सभी बच्चों को मुफत शिक्षा मिलेगी। ऐसे में किसी भी बच्चे को काम पर लगाना कानूनन जुर्म माना जायेगा। राज्य का यह कर्तव्य निर्धारित किया गया कि पैसे के लालच या कमी कि वजह किसी बच्चे क ो बालश्रम के लिये मजबूर न करे।
भारत में बाल श्रम की स्थिति
कई गैर सरकारी सक्रिय संगठनों के  मुताबिक भारत में साल 2010 तक 6 करोड़ बाल मजदूर हैं। जिसमें 1 करोड़ बंधुआ मजदूर हैं, क्योंकि वो बंधुआ मजदूर के यहां पैदा हुए होते हैं। जिसमें 50 लाख ओद्योगिक कामों में लगे हुए हैं। राष्टï्रीय बाल अधिकार आयोग की वेबसाइट पर मौजूद 2001 के आकड़ों में बाल मजदूरों की संख्या 1.27 करोड़ है। देश में राष्टï्रीय बाल अधिकार आयोग के अलावा दिल्ली, बिहार और 9 राज्यों में ही बाल अधिकार आयोग है। जो पूरी तरह से सक्रिय नहीं हैं।
बाल श्रम के प्रभाव
चाय की हर छोटी दूकान पर गिलास धोने का काम और चाय देने का काम एक छोटू करता है। जिससे वह बहुत सारी चीजों से वंचित रह जाता है। शिक्षा, नैतिकता और समाजिकता जैसी महत्वपूर्ण चीजों से वो वाकिफ नहीं हो पाते हैं। बाल श्रम की वजह से गरीबी बढ़ी है। जो विकास में सबसे बड़ी बाधा है। अल्पायु में मौत या भयानक रोग से बच्चे चपेट में आ जाते हैं। आने वाली पीढ़ी को समस्याएं विरासत में मिलती हैं। देश का भविष्य इससे खराब होता है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

Monday, June 2, 2014

अनुच्छेद-370 लम्हों की खता , सदियों को सजा ॥॥॥॥॥

अनुच्छेद 370 भारतीय संविधान का सबसे विवादित और विशेष अनुच्छेद है, जिसे आर्टिकल 370 भी कहते हैं। इसकी वजह

से राज्य जम्मू कश्मीर को अन्य राज्यों की तुलना में अलग से संवैधानिक छूट प्राप्त है। आजादी के बाद से लेकर अब तक ये

धारा भारतीय राजनीति में हड़कम्प मचाती रही है। पूर्व प्रधानमंत्री पण्डित जवाहर लाल नेहरू के विशेष हस्तक्षेप से ये धारा

तैयार की गयी थी। भारतीय संविधान में ये धारा अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष उपबन्ध सम्बन्धी भाग 21 में है। इस

धारा का सबसे ज्यादा विरोध बीजेपी और अन्य राष्टï्रवादी दल करते रहें हैं। उनकी हमेशा से ये मांग रही है कि कश्मीर से

अनुच्छेद 370 को पूरी तरह से खत्म किया जाये और पूरे देश में एक समान नागरिकता का संविधान लागू किया जाए। बीजेपी

ने तो इसे अपने हर चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल किया है।
1947 में अनुच्छेद 370 का खाका शेख अब्दुल्ला ने तैयार किया था जिनको पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू और कश्मीर के राजा हरि

सिंह ने कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया था। अब्दुल्ला चाहते थे कि धारा 370 स्थायी रूप से लागू हो। लेकिन नेहरू ने

इसे नकार दिया था। 1965 तक कश्मीर में राज्यपाल को सदर-ए-रियासत और मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था।

हालांकि उस समय नेहरू को छोड़कर लगभग सारे लोग इस अनुच्छेद के खिलाफ थे। भीमराव अम्बेडकर भी इससे नाखुश

थे। ये सिर्फ 10 सालों तक लागू किया गया था। जिसे बाद में एक खास वर्ग और वोट बैंक की राजनीति को साधने के चक्कर

में सरकारें बढ़ाती गयीं।

क्या विशेष है अनुच्छेद 370ï में ?

धारा 370 के प्रावधानों के अनुसार, संसद को जम्मू कश्मीर के बारे में रक्षा, विदेश मामले और संचार के विषय में कानून

बनाने का अधिकार है लेकिन किसी अन्य विषय से सम्बन्धित कानून को लागू करवाने के लिये केन्द्र को राज्य सरकार का

अनुमोदन चाहिये। इसी विशेष दर्जे के कारण जम्मू कश्मीर राज्य पर संविधान की धारा 356 लागू नहीं होती। इस कारण

राष्टï्रपति के पास राज्य के संविधान को बर्खास्त करने का अधिकार नहीं है। 1976 का शहरी भूमि कानून भी वहां लागू नहीं

होता है। इसके तहत भारतीय नागरिक को विशेष अधिकार प्राप्त राज्यों के अलावा भारत में कहीं भी भूमि खरीदने का   अधि

कार है। यानी भारत के दूसरे राज्यों के लोग जम्मू कश्मीर में जमीन नहीं खरीद सकते। धारा 360 जिसके तहत वित्तीय

आपातकाल लगाने का प्रावधान है, लेकिन ऐसा कश्मीर में नहीं होता।

विशेष अधिकार -

जम्मू कश्मीर के नागरिकों के पास दोहरी नागरिकता होती है। उनका राष्टï्रध्वज अलग होता है। विधानसभा का कार्यकाल 6

वर्षों का होता है। वहां भारत के राष्टï्रध्वज या राष्टï्रीय प्रतीक का अपमान करने पर कोई अपराध नहीं माना जाता है। भारत के

सुप्रीम कोर्ट का आदेश राज्य में मान्य नहीं है। ससंद सिर्फ सीमित क्षेत्रों में ही कानून बना सकती है। जम्मू कश्मीर की महिला

अपने राज्य से बाहर शादी करती है तो उसे कश्मीर की नागरिकता गवांनी पड़ती है। लेकिन अगर वहीं वो किसी पाकिस्तान क

े नागरिक से शादी करती है तो उस पाकिस्तानी को वहां की नागरिकता मिल जायेगी। आरटीआई, आरटीई और कैग वहां

लागू नहीं है। एक मायने में भारत का कोई भी कानून वहां नहीं लागू होता है।  कश्मीर में महिलाओं पर शरियत लागू है। वहां

पंचायती राज नहीं है। चपरासी को 2500 रूपये ही मिलते हैं , हिंदू-सिख अल्पसख्यकों को 16 प्रतिशत आरक्षण भी नहीं प्राप्त

है। कश्मीर में रहने वाले पाकिस्तानी को भारत की नागरिकता भी मिल जाती है जबकि अन्य भारतीय वहां जमीन तक नहीं ले

सकता है।

Sunday, June 1, 2014


सारा आम तो कैटरीना ले गयी ।।।।।।


जून शुरू होने को है और इसबार एक भी दशेहरी आम अब तक खाने को नहीं मिला है। फलों का राजा आम जो हर आम और खास की हथेली तक पहुंचता है। लेकिन अभी इसका सभी को इन्तजार है। पता नहीं कहां है वो मलिहाबादी जो अभी तक हमारे शहर नहीं पहुंचा है। बड़ी उम्मीद है इस बार भी हर बार की तरह कि जब तुम आओगे तो गर्मी घटाओगे। अभी तो खासा हरे हो खट्टे भी हो, लेकिन जब तुम्हारा रंग हल्का पीला और लाल होने लगता है और तुम मीठे हो जाते हो। तो तुमको देखकर मुंह में सिर्फ पानी आता है, डाल की तोड़ी हुई दशहरी जब बाल्टी भर पानी में डालकर हम आम आदमी खाना शुरू करते हैं तो उसका मजा ही कुछ और है। वो दिन आज भी बहुत याद आते हैं जब बैरिस्टर साहब के साढ़े तीन सौ बीघे वाले बाग में हम आम चुराने जाया करते थे। हमारे श्रावस्ती में ये सबसे बड़ी बाग है। वैसे बाग तो हमारे यहां भी हैं , लेकिन देशी आम की और हमें उस वक्त चस्का दशहरी का। वैसे आम तो आजकल हर जगह आपको बोतलों में मिल जायेगा।





स्लाइस, माजा, फ्रुटी और तमाम ऐसे पेय पदार्थ जो ये दावा करते हैं कि हम आपको हर मौसम में आम की कमी नहीं खलने देंगे। लेकिन क्या ऐसा सम्भव है , मेरे हिसाब से बिल्कुल नहीं वो स्वाद कहां बोतल वाले आम में। शाहरूख से लेकर सनी देओल तक बोतल वाले आम का प्रचार करने में लगे हैं और मेरे लिखने की वजह बनीं कैटरीना जो आम का आमसूत्र भी बता रहीं हैं। वाक्या ये हुआ मैंगो शेक मांगने पर जब सामने से आम के न होने का जवाब आता है, तो मेरा क्यों ? शायद मेरे हिसाब से लाजिमी भी था। तो जवाब मिलता है कि सारा आम कैटरीना ले गयी। शायद उसका जवाब उम्दा था। आमसूत्र यूं ही नहीं कैटरीना ने पेश कर दिया है। वैसे छोडि़ए आमसूत्र वाली कैटरीना को और याद करिए जरा अमेरिका वाली कैटरीना को जिसकी वजह से भारी तबाही मची थी। दो दिन पहले वाली आंधी ने आम और आम जन को काफी नुकसान पहुंचाया दोनों आम जमीन पर आ गये। तो कैटरीना कोई भी हो लेकर वो आम को ही जाती है। चाहे वो पेड़ वाला आम हो या फिर आम अवाम हो। कैटरीना की अदा ही खतरनाक है। तो होशियार रहें कैटरीना से।



आम की फोटो इंटरनेट से ली गयी हैं।